खिड़कियों के साथ चलता था कभी मैं
एक चेहरा देख ढलता था कभी मैं
हॅंस दिया करती मिरी जो बात पे तू
याद में डूबा टहलता था कभी मैं
सुब्ह की जो चाय पीते साथ जब हम
मोम बन हर पल पिघलता था कभी मैं
आँख मेरी पढ़ लिया करती तुझे फिर
ख़्वाब में दिन भर बहलता था कभी मैं
— Vinod Ganeshpure















