टूट कर जो बिखरा रिश्ता जोड़ देता
आज भी कल को हमेशा मोड़ देता
मैं बिना कुछ भी पढ़े ही रोज़ पन्ने
यूँ किताबों के हमेशा छोड़ देता
पेड़ में होते लगे जो फूल उन को
मैं खिला ही जो नहीं था तोड़ देता
जिस्म में आ कर बसी है रूह अपने
ज़िंदगी को श्राप कहता छोड़ देता
— Vinod Ganeshpure















