jaane kya kuchh kar baitha hai | जाने क्या कुछ कर बैठा है

  - Vigyan Vrat

जाने क्या कुछ कर बैठा है
बहुत दिनों से घर बैठा है

वो मधुमास लिखे भी कैसे
शाखों पर पतझर बैठा है

  - Vigyan Vrat

Ghar Shayari

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    अच्छा अब ये तो बतलाओ
    कैसे अपने जैसे हो तुम

    यार सुनो घबराते क्यों हो
    क्या कुछ ऐसे वैसे हो तुम

    क्या अब अपने साथ नहीं हो
    तो फिर जैसे तैसे हो तुम

    ऐश-परस्ती तुम से तौबा
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    ख़्वाबों की ता'बीरें भी हों
    यादों की तस्वीरें भी हों

    अपने उनवानों जैसी ही
    काश कि कुछ तहरीरें भी हों

    लाख तरीक़े मर जाने के
    जीने की तदबीरें भी हों

    सिर्फ़ लकीरों से क्या होगा
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    सिर्फ़ उठें जो हक़ की ख़ातिर
    कुछ ऐसी शमशीरें भी हों
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    जितने लोग शहर में हैं
    एक मुसलसल डर में हैं

    मंज़िल पीछे छूट गई
    फिर भी लोग सफ़र में हैं

    सिर्फ़ मिरे क़दमों के निशाँ
    मेरी राहगुज़र में हैं

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    ख़ैर तो है 'विज्ञान' मियाँ
    काफ़ी दिन से घर में हैं
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    यूँ तो साथ ज़माना है
    पर ख़ुद से बेगाना है

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    वो इतने दिन बाद मिला
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    तुम से घर कहलाता था
    अब तो सिर्फ़ घराना है
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