अहले दुनिया नया नया हूँ मैं
माज़रत, ख़्वाब देखता हूँ मैं
उस की तस्वीर है घड़ी के पास
हर घड़ी वक़्त देखता हूँ मैं
इस क़दर तीरगी का क़ाइल हूँ
धूप को धूप कह रहा हूँ मैं
है परिंदों से ख़ामुशी दरकार
पेड़ से बात कर रहा हूँ मैं
— Vikram Sharma
माज़रत, ख़्वाब देखता हूँ मैं
उस की तस्वीर है घड़ी के पास
हर घड़ी वक़्त देखता हूँ मैं
इस क़दर तीरगी का क़ाइल हूँ
धूप को धूप कह रहा हूँ मैं
है परिंदों से ख़ामुशी दरकार
पेड़ से बात कर रहा हूँ मैं
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