वो गले बदहवा से लगते हैं
उन को हम ग़म-शनास लगते हैं
इक ज़माने की दूरियाँ हैं मगर
दूर होकर भी पास लगते हैं
अब उदासी ये हम पे जँचती है
अब तो हँसते उदास लगते हैं
हम में कमियाँ तो लाख हैं ताबिश
हम उसे फिर भी ख़ास लगते हैं
— Vishal Singh Tabish
उन को हम ग़म-शनास लगते हैं
इक ज़माने की दूरियाँ हैं मगर
दूर होकर भी पास लगते हैं
अब उदासी ये हम पे जँचती है
अब तो हँसते उदास लगते हैं
हम में कमियाँ तो लाख हैं ताबिश
हम उसे फिर भी ख़ास लगते हैं
Other ghazal from the same pen
Shers of sad shayari collection.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling