बस यही इक बात पर वो रो दिया है
दूर हो कर उस ने क्या क्या खो दिया है
इक शजर भी वो नहीं है जब लगाता
बीज वो फिर किस तरह के बो दिया है
घर के मेरे छत नहीं अब सूखती है
धूप को बारिश ने जो अब धो दिया है
इस तरह हम को नहीं वो चाहिए है
आ के वापस ले जा अब तक जो दिया है
— Vishesh asthana















