तिरी तस्वीर जो मैं ने दिखाई है
बड़ी फ़ुर्सत से मैं ने ये बनाई है
उसे ये लग रहा हैं ये लतीफ़े हैं
मगर बस इक ग़ज़ल मैं ने सुनाई है
मिरे घर भी कभी ये चाँद उतरेगा
अभी फ़िलहाल इक लौ ही जलाई है
दरख़्तों के तले कुछ यार बैठे हैं
बड़े दिन बा'द इक महफ़िल सजाई है
नहीं रहती सही मेरी तबीयत अब
मोहब्बत ही तिरी अब इक दवाई है
मैं बच्चों के खिलौने किस तरह लाता
कि क़ीमत उस ने ऐसी जो लगाई है
मिरे इन बज़्म में तुम भी कभी आना
यहाँ वो रात मुश्किल से बिताई है
— Vishesh asthana















