कौन किस का यहाँ आज मेहमान है
आदमी आदमी से परेशान है
रात भी चाँद भी नींद भी है यहाँ
आज सोना यहाँ कितना आसान है
जश्न वो जीत का है मनाता यहाँ
कल के उस हार से आज अनजान है
लोग इतराते हैं कौन सी बात पर
ख़ाक है सब यहाँ झूठी हर शान है
बात तक वो नहीं कर सका क्या हुआ
कल तलक कहता था जो मुझे जान है
और क्या देखना रह गया है ख़ुदा
बे-ख़बर दर्द से कौन इंसान है
साँस आती नहीं है हवा में मुझे
इस से बेहतर तो मेरा ये ज़िंदान है
— Vishesh asthana















