तिरा जो हाथ था
में अब खड़ा हूँ मैं
लगे है अब ज़माने से बड़ा हूँ मैं
कभी तो खोल कर तू देख दरवाज़े
तिरी दहलीज़ पर कब से पड़ा हूँ मैं
कभी कुछ तो मिरी भी सुन लिया कर तू
न जाने कब से इक ज़िद पर अड़ा हूँ मैं
न बंदूकें न तलवारे न शमशीरें
न जाने जंग वो कैसे लड़ा हूँ मैं
मुझे तू मारता है रोज़ पत्थर से
कभी मैं ने कहा था इक घड़ा हूँ मैं
— Vishesh asthana















