तुम अपने जज़्बों की मुझ पर इनायत क्यूँ नहीं करते
मोहब्बत है नहीं मुझ से तो नफ़रत क्यूँ नहीं करते
सुना है इस मोहब्बत को समझते हो शरारत तुम
हमारे साथ फिर तुम ये शरारत क्यूँ नहीं करते
किसी को क्या बताएँ बाक़ी इंसानों के जैसे हम
किसी भी हादसे पर कोई हैरत क्यूँ नहीं करते
मेरे अपनों को गिनवाते हो मेरे ऐब तुम हर बार
कभी मुझ से ही तुम मेरी शिकायत क्यूँ नहीं करते
अगर है इश्क़ उस से तो उसे पाने की ख़ातिर तुम
जुनूँ की हद से भी आगे की वहशत क्यूँ नहीं करते
— Viru Panwar Viyogi















