"मुनाजात"

तेरे दर पे ये गुनहगार चला आया है
तेरी रहमत का तलबगार चला आया है

ज़िंदगी मेरी भी तू इस तरह अनवर कर दे
मेरे सीने को तू ईमाँ से मुनव्वर कर दे

नेक राहों पे मुझे चलने का जज़्बा दे दे
जो मुझे तेरी तरफ़ लाए वो रस्ता दे दे

राह-ए-बिदअत से भी मुझ को तू बचाना या रब
अपने महबूब के रस्ते पे चलाना या रब

मैं गुनहगार सही हूँ तो तेरा ही बंदा
तेरे ही रहम-ओ-करम पर हूँ अभी तक ज़िंदा

जब भी मैं कश्मकश-ए-जीस्त से घबराता हूँ
बहर-ए-तस्कीन तेरे दर पे चला आता हूँ

मुझ गुनहगार पे रहमत के भी साए रखना
मेरे मौला मेरी हर बात बनाए रखना

सर बुलंदी के लिए आप का दम भरता हूँ
आप की ज़ात से उम्मीद-ए-करम रखता हूँ

— Abdul Rahman "Vaahid"

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