खु़शामद कर के याँ लाया गया हूँ
मगर महफ़िल से उठवाया गया हूँ
अचानक छोड़ कर यूँ बज़्मे-जानाँ
नहीं आया, मगर लाया गया हूँ
फ़रिश्ता हूँ न कोई पारसा हूँ
मैं आदम हूँ जो बहकाया गया हूँ
मैं हूँ इक ख़्वाब पर इतना बता दे
तिरी आँखों में क्यूँ पाया गया हूँ
दिखा कर चाँद में चेहरा तुम्हारा
किसी बच्चे सा बहलाया गया हूँ
मुसलसल हिचकियाँ आने लगी हैं
तो क्या मैं याद फ़रमाया गया हूँ
मुसाफ़िर था, सरा-ए-दिल में तेरे
फ़क़त कुछ दिन ही तो आया गया हूँ
तवक़्को़ यूँ तो उन से कुछ नहीं थी
भरोसा दे के भरमाया गया हूँ
विसाले यार है 'साहिल' क़ज़ा तो
मलाइक भेज बुलवाया गया हूँ
— Wajid Husain Sahil















