lahu na ho to qalam tarjumaan nahin hota | लहू न हो तो क़लम तर्जुमाँ नहीं होता

  - Waseem Barelvi

लहू न हो तो क़लम तर्जुमाँ नहीं होता
हमारे दौर में आँसू ज़बाँ नहीं होता

जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा
किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता

ये किस मक़ाम पे लाई है मेरी तन्हाई
कि मुझ से आज कोई बद-गुमाँ नहीं होता

बस इक निगाह मिरी राह देखती होती
ये सारा शहर मिरा मेज़बाँ नहीं होता

तिरा ख़याल न होता तो कौन समझाता
ज़मीं न हो तो कोई आसमाँ नहीं होता

मैं उस को भूल गया हूँ ये कौन मानेगा
किसी चराग़ के बस में धुआँ नहीं होता

'वसीम' सदियों की आँखों से देखिए मुझ को
वो लफ़्ज़ हूँ जो कभी दास्ताँ नहीं होता

  - Waseem Barelvi

Khyaal Shayari

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As you were reading Shayari by Waseem Barelvi

    मैं इस उमीद पे डूबा कि तू बचा लेगा
    अब इस के बा'द मिरा इम्तिहान क्या लेगा

    ये एक मेला है वा'दा किसी से क्या लेगा
    ढलेगा दिन तो हर इक अपना रास्ता लेगा

    मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा
    कोई चराग़ नहीं हूँ कि फिर जला लेगा

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    जो बे-अमल है वो बदला किसी से क्या लेगा

    मैं उस का हो नहीं सकता बता न देना उसे
    लकीरें हाथ की अपनी वो सब जला लेगा

    हज़ार तोड़ के आ जाऊँ उस से रिश्ता 'वसीम'
    मैं जानता हूँ वो जब चाहेगा बुला लेगा
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    Waseem Barelvi
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    उसको फ़ुर्सत नहीं मिलती कि पलट कर देखे
    हम ही दीवाने हैं दीवाने बने रहते हैं
    Waseem Barelvi
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    दूर से ही बस दरिया दरिया लगता है
    डूब के देखो कितना प्यासा लगता है
    Waseem Barelvi
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    कितना दुश्वार था दुनिया ये हुनर आना भी
    तुझ से ही फ़ासला रखना तुझे अपनाना भी

    कैसी आदाब-ए-नुमाइश ने लगाईं शर्तें
    फूल होना ही नहीं फूल नज़र आना भी

    दिल की बिगड़ी हुई आदत से ये उम्मीद न थी
    भूल जाएगा ये इक दिन तिरा याद आना भी

    जाने कब शहर के रिश्तों का बदल जाए मिज़ाज
    इतना आसाँ तो नहीं लौट के घर आना भी

    ऐसे रिश्ते का भरम रखना कोई खेल नहीं
    तेरा होना भी नहीं और तिरा कहलाना भी

    ख़ुद को पहचान के देखे तो ज़रा ये दरिया
    भूल जाएगा समुंदर की तरफ़ जाना भी

    जानने वालों की इस भीड़ से क्या होगा 'वसीम'
    इस में ये देखिए कोई मुझे पहचाना भी
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    Waseem Barelvi
    अपनी इस आदत पे ही इक रोज़ मारे जाएँगे
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    Waseem Barelvi
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