कैसे मुमकिन है के हर शख़्स का प्यारा होना
दिन में तारों को मुयस्सर न हो तारा होना
हम ही नादान थे जो तुझ पे फ़िदा थे वरना
चाहता कोई था शिद्दत से हमारा होना
अब दुआ है के नहीं तुझ से कभी मिलना हो
तुझ से मिलना के किसी दर्द का मारा होना
दौर-ए-हिज्राँ में ये अहबाब हैं ऐसे जैसे
बीच दरिया में भी मौजूद किनारा होना
सहल कितना है गिराना किसी रहरू को याँ
कितना दुशवार है गिरतों का सहारा होना
लौट आए हो लिए ज़ख़्म ज़माने का पर
हम से होगा नहीं अब ज़ख़्म का चारा होना
अब गिरफ़्तार हैं हम अपनी अना में वासिफ़
हम को मंज़ूर नहीं इश्क़ दुबारा होना
— Wasif Iqbal















