ये वापस लहर को कर दे के मुस्तहकम किनारा है
उख़ुव्वत का अलम ले कर किसी ने तो पुकारा है
जो बिजली अब गिरी तो फिर यहाँ तुम ज़द में आओगे
पलट दो तख़्त ज़ालिम का ये क़ुदरत का इशारा है
ये वीरानी परेशानी सभी को सच समझता हूँ
यही दो-चार चीज़ें हैं कि जिस से अब गुज़ारा है
अदा करने से हक़ अपना तो अब क़ासिर नज़र आए
हुकूमत छीन लेंगे हम जो कुर्सी का सहारा है
नहीं है गर्द-ए-महकूमी वतन महबूब पर वासिफ़
मेरे अज्दाद ने इस को लहू दे कर निखारा है
— Wasif Iqbal















