अपने आबा कि विरासत भी हमें याद नहीं
मौत ज़ंजीर है इंसाँ कोई आज़ाद नहीं
ताज को सर पे सजाने को तो तैयार हैं सब
सर कटाने के लिए एक भी अफ़राद नहीं
इन रईसों की ज़माने से है ये ख़ास अदा
ज़र लुटा देते हैं रक़्क़ासा में इमदाद नहीं
ये तशद्दुद का सिला ही है कि हम जान गए
ज़ुल्म कमज़ोर तो कर सकता है बर्बाद नहीं
गुल को फिर राख न कर दे ये अदावत की हवा
बाग़बाँ हम भी हैं गुलशन ही के सय्याद नहीं
ये शिकायत तो उसी ज़ुल्म से वाबस्ता है पर
मेरी फ़रियाद फ़क़त मेरी ही फ़रियाद नहीं
कर के तफ़तीश ये पाया कि बिना इल्म के लोग
घर तो बन जाते हैं जिस की कोई बुनियाद नहीं
हाए 'वासिफ़' तेरे मस्कन को जो बर्बाद किया
मुझ को हैरत है कि घर उस का भी आबाद नहीं















