सब्र करता नहीं यहाँ कोई
और फल चाहते हैं मीठा लोग
और फल चाहते हैं मीठा लोग
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कहाँ से सीखा है तुम ने ये अरहम
की हर इक बात पे बस चीखना है
की हर इक बात पे बस चीखना है
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ज़रा तो सोच दिल को तोड़ने वाले
कि तेरा हश्र के दिन हाल क्या होगा
कि तेरा हश्र के दिन हाल क्या होगा
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मैं उस को अपना सब कुछ मानता था
मेरा होना भी जिस का मसअला था
मेरा होना भी जिस का मसअला था
मोहब्बत ख़त्म होने जा रही थी
वो मेरे साथ अब उकता रहा था
मेरी चीखें भी सुन के वो न लौटा
जो आहट तक मेरी पहचानता था
रवानी ख़ून की कम हो चुकी थी
गले मिलना ज़रूरी हो गया था
वो मुद्दत बा'द मुझ से मिल रही थी
मैं उस को देखते ही रो पड़ा था
मेरे सब ज़ख़्म यूँ तो भर चुके थे
मगर वो मुझ
में अब भी रह गया था
गँवा के उम्र अपनी सारी 'अरहम'
दुआ मरने की अब मैं कर रहा था
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ग़रीबी ओढ़ती है सिर पे चादर
अमीरी जिस्म ढकती क्यूँ नहीं है
अमीरी जिस्म ढकती क्यूँ नहीं है
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