Muhammad Fuzail Khan

Muhammad Fuzail Khan

@Fuzail_Khan

Fuzail Khan shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Fuzail Khan's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
  • Ghazal
  • Nazm

है यही आरज़ू-ए-नफ़स और क्या
एक लम्हा मोहब्बत का बस और क्या

दिल परिंदे को अब और क्या चाहिए
तेरी नज़दीक़ियों का क़फ़स और क्या

Muhammad Fuzail Khan

क्यों मेरे दिल तू बेक़रार है अब
दिल तुझे किसका इंतज़ार है अब

Muhammad Fuzail Khan

तेरे क़दमों से जो गलियां वाक़िफ थीं
उनसे रिश्ता एक पुराना तोड़ दिया

तुम क्या जानो उन गलियों पर क्या गुज़री
तुमने तो बस आना-जाना छोड़ दिया

Muhammad Fuzail Khan

जब से तुमने मिलना-जुलना छोड़ा है
हमने भी फिर सांसें भरना छोड़ दिया

तुम क्या जानो मेरे दिल पर क्या गुज़री
तुमने तो बस बातें करना छोड़ दिया

Muhammad Fuzail Khan

यही इक बात रह-रहकर मिरे दिल को सताती है
कि आख़िर क्यों वो रोया था बिछड़ने से ज़रा पहले

Muhammad Fuzail Khan

क़समें अगर न तोड़िए तो खाइए ज़रूर
वादा किसी से कीजे तो निभाइए ज़रूर

Muhammad Fuzail Khan

वो जब मिलेंगे तो ये बात उनसे पूछेंगे
कि मिल के आपसे क्यों दुनिया भूल जाते हैं

Muhammad Fuzail Khan

हमें ख़बर है कि तुमको हमसे
बहुत से शिकवे‌ शिकायतें हैं

Muhammad Fuzail Khan

देखने को तो एक सवारी बैठी है
लेकिन पीछे ज़िम्मेदारी बैठी है

Muhammad Fuzail Khan

निगाह ए ग़ौर से देखो‌ बड़े मजबूर हैं हम
उसी के पास में बैठे हैं जिससे दूर हैं हम

Muhammad Fuzail Khan

हमेशा की तरह फिर इक अधूरा ख़्वाब देखा है
हमेशा की तरह फिर से किनारा कर लिया तुमने

Muhammad Fuzail Khan

ऐसा खिलता गुलाब क्या भेजें
जिसकी खुशबू न तुम तलक पहुँचे

Muhammad Fuzail Khan

तेरे जाने से कुछ बचा ही नहीं
तू जो होता तो क्या नहीं होता

Muhammad Fuzail Khan

अपना भी है लेकिन वो पराया भी बहुत है
उस शख़्स को हाँ हमने सताया भी बहुत है

Muhammad Fuzail Khan

तिरी नज़रों से जो ख़ुद को अभी देखा हमने
हर ख़ामी में मुझको खू़बी नज़र आने लगी

Muhammad Fuzail Khan

जितना होना था हो चुकी बारिश
अब तो सब कुछ भिगो चुकी बारिश

वो जो छोड़ी थीं नांवें बचपन में
उनको कब का डुबो चुकी बारिश

Muhammad Fuzail Khan

तिरी-मेरी ये दूरी कह रही है
कहानी फिर अधूरी रह गई है

अभी आंगन में बैठे तो ख़्याल आया
कि बातें सब ज़रूरी रह गई हैं

Muhammad Fuzail Khan

कुछ घर अन्दर से बाहर तक जगमग-जगमग रहते हैं
कुछ घर के आंगन में केवल एक दीया ही जलता है

Muhammad Fuzail Khan

इस सोच में बैठे कि मिरी सोच का हर पल
किस सोच में गुज़रा है यही सोच रहा हूँ

Muhammad Fuzail Khan

तो क्यों न अब कुछ नया किया जाए
लबों से सब कुछ बयां किया जाए

Muhammad Fuzail Khan

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