Akram Jazib

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Akram Jazib shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Akram Jazib's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
रोज़-ए-अव्वल ही ख़ता-कार बनाया गया हूँ
और फिर अशरफ़-ए-मख़्लूक़ बताया गया हूँ

टूटने और बिखरने पे है वावैला क्यों
देखिए कितनी बुलंदी से गिराया गया हूँ

इख़्तियारात से तक़दीर से क्या लेना है
वक़्त की गर्द में तिनका सा उड़ाया गया हूँ

ज़िंदगी एक डगर पर ही कहाँ चलती है
कभी दीवार कभी दिल से लगाया गया हूँ

दोनों हाथों से लुटाते हुए ये तो सोचें
कितनी मेहनत से मोहब्बत से कमाया गया हूँ

मैं न यूसुफ़ हूँ न है कोई ख़रीदार मिरा
जाने क्या सोच के बाज़ार में लाया गया हूँ

इम्तिहाँ देने तलक याद जिन्हें रखा जाए
उन सवालात की मानिंद भुलाया गया हूँ

नोक-ए-ख़ंजर से सही वक़्त के हाथों लेकिन
गुदगुदी कर के कई बार हँसाया गया हूँ

इस ज़माने का हूँ मैं एक हँसी का मक़रूज़
जिस की पादाश में इक उम्र रुलाया गया हूँ

मसअला यूँ ही नहीं पेश फ़िशार-ए-ख़ूँ का
ख़ुद से उलझाया गया और लड़ाया गया हूँ

अजनबी लोग ज़मीं-ज़ाद नहीं लगते हैं
और सय्यारे पे शायद मैं बसाया गया हूँ

कनफ़्योशिस हो कि नानक हो कि बुद्धा गौतम
सो तरीक़ों से सबक़ एक पढ़ाया गया हूँ

लाख पर्दों में सही मेरी हक़ीक़त मलफ़ूफ़
मैं ब-हर-रंग ज़माने को दिखाया गया हूँ

मुझ को माहौल मुआफ़िक़ नहीं आया 'जाज़िब'
फूल हूँ और सर-ए-दश्त खिलाया गया हूँ
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Akram Jazib
बैठा हूँ अपनी ज़ात का नक़्शा निकाल के
इक बे-ज़मीन हारी हूँ सहरा निकाल के

ढूँडा बहुत मगर कोई रस्ता नहीं मिला
इस ज़िंदगी से तेरा हवाला निकाल के

अलमारी से मिले मुझे पहले पहल के ख़त
बैठा हुआ हूँ आप का वा'दा निकाल के

वीरानियों पे आँख छमा-छम बरस पड़ी
लाया हूँ मैं तो दश्त से दरिया निकाल के

आसानियाँ ही सोचते रहते हैं यार लोग
उक़्बा निकाल कर कभी दुनिया निकाल के

हम रफ़्तगाँ से हट के भी देखें तो शे'र में
मौज़ूअ' कम ही बचते हैं नौहा निकाल के

मिलना कहाँ था सहल दर-ए-आगही मुझे
आया हूँ मैं पहाड़ से रस्ता निकाल के

वाइ'ज़ निहाल आज ख़ुशी से है किस क़दर
इक ताज़ा इख़्तिलाफ़ का नुक्ता निकाल के

मुनइ'म को उस निवाले की लज़्ज़त का क्या पता
मज़दूर जो कमाए पसीना निकाल के

हालात क्या ग़रीब के बदले कि हर कोई
ले आया है क़रीब का रिश्ता निकाल के

'जाज़िब' कहाँ ख़बर थी कि है बाज़ ताक में
हम शाद थे क़फ़स से परिंदा निकाल के
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Akram Jazib
रफ़ाक़तों का भरम तोड़ जाने वाला नहीं
मुक़ाबले में अगर आया तर-निवाला नहीं

पड़ी हुई है नसब क़ैस से मिलाने की
किसी ने दश्त मुकम्मल मगर खंगाला नहीं

यहाँ बुलंद सदाएँ लगा ग़ुबार उड़ा
दयार-ए-इश्क़ है तहज़ीब का हवाला नहीं

हमारे अहद के सुक़रात मस्लहत-बीं हैं
किसी के हाथ में भी ज़हर का प्याला नहीं

सफ़र में रहने से इस को क़रार रहता है
ये ज़ख़्म दिल का है पाँव का कोई छाला नहीं

हवा के हाथ लगी ख़ुश्बूओं ज़रा सुन लो
सँभाले कौन अगर फूल ने सँभाला नहीं

ये जिस ने रिज़्क़ की तंगी पे ख़ुद-कुशी कर ली
कहीं समाज ने मिल कर तो मार डाला नहीं

करेंगे यूँही सदा इंतिज़ार साहिल पर
गुहर तहों से समुंदर ने जो उछाला नहीं

ये एहतियात पसंदी कहाँ से आई है
अगर ज़बाँ पे कोई मस्लहत का ताला नहीं

कहानियाँ न तराशें ख़याली दुनिया की
कहाँ जहान में तफ़रीक़ पस्त-ओ-बाला नहीं

इजारा-दारियाँ क़ाएम हैं किस लिए 'जाज़िब'
कोई हवाला अगर मो'तबर हवाला नहीं
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