roz-e-awwal hi khata-kaar banaya gaya hooñ | रोज़-ए-अव्वल ही ख़ता-कार बनाया गया हूँ

  - Akram Jazib
रोज़-ए-अव्वलहीख़ता-कारबनायागयाहूँ
औरफिरअशरफ़-ए-मख़्लूक़बतायागयाहूँ
टूटनेऔरबिखरनेपेहैवावैलाक्यूँ
देखिएकितनीबुलंदीसेगिरायागयाहूँ
इख़्तियारातसेतक़दीरसेक्यालेनाहै
वक़्तकीगर्दमेंतिनकासाउड़ायागयाहूँ
ज़िंदगीएकडगरपरहीकहाँचलतीहै
कभीदीवारकभीदिलसेलगायागयाहूँ
दोनोंहाथोंसेलुटातेहुएयेतोसोचें
कितनीमेहनतसेमोहब्बतसेकमायागयाहूँ
मैंयूसुफ़हूँहैकोईख़रीदारमिरा
जानेक्यासोचकेबाज़ारमेंलायागयाहूँ
इम्तिहाँदेनेतलकयादजिन्हेंरखाजाए
उनसवालातकीमानिंदभुलायागयाहूँ
नोक-ए-ख़ंजरसेसहीवक़्तकेहाथोंलेकिन
गुदगुदीकरकेकईबारहँसायागयाहूँ
इसज़मानेकाहूँमैंएकहँसीकामक़रूज़
जिसकीपादाशमेंइकउम्ररुलायागयाहूँ
मसअलायूँँहीनहींपेशफ़िशार-ए-ख़ूँका
ख़ुदसेउलझायागयाऔरलड़ायागयाहूँ
अजनबीलोगज़मीं-ज़ादनहींलगतेहैं
औरसय्यारेपेशायदमैंबसायागयाहूँ
कनफ़्योशिसहोकिनानकहोकिबुद्धागौतम
सोतरीक़ोंसेसबक़एकपढ़ायागयाहूँ
लाखपर्दोंमेंसहीमेरीहक़ीक़तमलफ़ूफ़
मैंब-हर-रंगज़मानेकोदिखायागयाहूँ
मुझकोमाहौलमुआफ़िक़नहींआया'जाज़िब'
फूलहूँऔरसर-ए-दश्तखिलायागयाहूँ
  - Akram Jazib
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