boxes-v1
logo
coin0
  • Search
  • Shayari
  • Writers
  • Events
  • Blog
  • Store
  • Help
  • Login
  • home-v1
  • swipe
  • feather-v4
  • shopping-bag-v1
  • user-v1
cross
preview

By:

00:00/00:00

playButtonWhite
backChandrabhan Khayal

Top 10 of Chandrabhan Khayal

Chandrabhan Khayal

Top 10 of Chandrabhan Khayal

    बस्ती की बीमार गली में
    शहनाई जब जब गूँजी है

    माँ ने अक्सर मुझ से कहा है
    तुम भी अपना ब्याह रचा लो

    मैं घर के कोने में बैठा
    शोर सुन रहा हूँ शहरों का

    घाइल नदियों की लहरों का
    पर्बत पर बैठा इक जोगी

    अपनी आँखें बंद किए मुझ पर हँसता है
    और वो मुस्तक़बिल की औरत

    कभी सरासर ज़हर उगलती
    कभी अनोखा ज़हर निगलती

    पीट रही है चाट रही है छाती मेरी
    दरिया जंगल पर्बत सहरा

    शोर है कितना अंदर बाहर
    पल पल जैसे कूड़े लगा रही है ख़्वाहिश

    सदियों के प्यासे नेज़े पैवस्त हुए फिर
    सूखी और बे-रंग रगों में

    ख़ून के इक क़तरे की ख़ातिर
    सदियों की राहें तय करना

    कोई मुश्किल काम नहीं है
    बहर-ए-कशाकश के साहिल पर

    राहत पत्थर तोड़ रही है
    मौज-ए-तमन्ना चट्टानों से अपना माथा फोड़ रही है

    मैं घर के कोने में बैठा
    शोर सुन रहा हूँ ममता का

    हाँ अब मैं सोच रहा हूँ
    ऐसा कोई रास रचाऊँ

    अम्माँ की बूढ़ी छाती पर
    एक नया सदमा बन जाऊँ
    Read Full
    Chandrabhan Khayal
    Share
    10
    0 Likes
    लहू-नोश लम्हों के बेदार साए
    उसे घेर लेंगे सिनानें उठाए
    तमाज़त-ज़दा शब ज़न-ए-बाकरा सी
    सिमट जाएगी और भी अपने तन में

    वो सूरज का साथी अँधेरों के बन में
    असासा लिए फ़िक्र का अपने फ़न में
    शुआओं की सूली पे ज़िंदा टंगा है
    न अब शहर में कोई इतना हज़ीं है

    ग़ज़बनाक तन्हाइयों को यक़ीं है
    कि उस के मुक़द्दर में वो ख़ुद नहीं है
    वो इक इन्फ़िरादी हक़ीक़त का हामी
    फ़सीलों पे वहम-ओ-गुमाँ की खड़ा है

    शहर-ज़ाद शबनम से ये पूछता है
    कि सूरज के सीने में क्या क्या छपा है
    मगर शाम की सुर्ख़ आँखों ने इस पर
    हमेशा सुलगती हुई राख डाली

    तह-ए-आतिश-ए-सुर्ख़-रू वो सवाली
    कि जिस ने हथेली पे सरसों जमा ली
    किसी देवता की निगाह-ए-ग़ज़ब से
    बना अजनबी अपने आबाद घर में

    कभी इस नगर में कभी उस नगर में
    कभी बस गया सिर्फ़ दीवार-ओ-दर में
    वो इक शख़्स तन्हा कि जिस का अभी तक
    सफ़र है मुसलसल न घर मुस्तक़िल है

    फ़क़त पास में उस के मासूम दिल है
    मगर किस क़दर मुज़्तरिब मुज़्महिल है
    जो शहर-ए-अना में खड़ा सोचता है
    कहाँ रात काटे कहाँ दिन बिताए

    हथेली पे दुनिया का नक़्शा बनाए
    भटकता है वो आज भी चोट खाए
    अरे गुम-शुदा आदमी आ के मिल जा
    अरे गुम-शुदा आदमी आ के मिल जा
    Read Full
    Chandrabhan Khayal
    Share
    9
    0 Likes
    नींद के तआक़ुब में
    दूर दूर तक ला-हासिल
    देर से भटकता हूँ
    नीली आँखों वाली
    जंगली बिल्ली
    बार बार दुम हिलाती है
    मेरी चारपाई के नीचे
    नीम रौशन लैम्प के इर्द-गिर्द
    कीड़ों पर झपटती छिपकली
    बे-ख़बर है अपने अंत से
    कितना ग़ैर-मुतवक़्क़े होगा
    मिल जाना अनंत से

    मिट्टी के तेल की गंध
    क़ुलांचें भर रही है कमरे में
    बे-लगाम घोड़ी की तरह
    छत पर
    रेंगती हुई ख़ामोशी
    बार बार दोहरा रही है
    पापी निशाचरों का गीत

    और नींद मीलों दूर
    किसी ना-मालूम दरख़्त के पत्तों में छुपी
    चिड़ियों सा चहचहा रही है
    मुझे बुला रही है
    Read Full
    Chandrabhan Khayal
    Share
    8
    0 Likes
    आज फिर घात में बैठा है समुंदर का सुकूत
    हम को इक दूसरे से दूर ही रहना होगा
    हम को हर हाल में मजबूर ही रहना होगा

    मुझ को इस दौर-ए-जराहत से गुज़र जाने दे
    मुझ को जीने की तमन्ना नहीं मर जाने दे
    मेरी तक़दीर में ग़म हैं तो कोई बात नहीं
    मुझ को ज़ुल्मत की गुफाओं में उतर जाने दे

    तू न घबरा कि तिरे हुस्न की मिश्अल ले कर
    तेरे हमराह कभी तेरे बिछौने के क़रीब
    रात भर धूम मचाएगा मिरे जिस्म का भूत
    आज फिर घात में बैठा है समुंदर का सुकूत

    ज़र्फ़ बाक़ी न कोई अज़्म-ए-निहाँ बाक़ी है
    सिर्फ़ एहसास के चेहरे पे धुआँ बाक़ी है
    कोई साया है न साथी है न महफ़िल कोई
    दिलकशी ख़त्म है फिर क्यूँँ ये जहाँ बाक़ी है

    ये जहाँ जिस में सब अतराफ़ तबाही के निशाँ
    सूरत ओ शक्ल पे ज़ख़्मों की तरह फैले हैं
    और हर ज़ख़्म है इंसान की वहशत का सुबूत
    आज फिर घात में बैठा है समुंदर का सुकूत

    तल्ख़ तन्हाई का इक दर्द लिए चेहरे पर
    ले के फिरता हूँ मैं ज़ख़्मों के दिए चेहरे पर
    रूह मजरूह जबीं ज़ख़्म-ज़दा दिल घाइल
    फिर भी हँसता हूँ नई आस लिए चेहरे पर

    ज़िंदगी है कि किसी शाह की बेगम जिस को
    वक़्त बाज़ार में लाया है बरहना कर के
    और ख़ामोश हैं तहज़ीब ओ तमद्दुन के सपूत
    आज फिर घात में बैठा है समुंदर का सुकूत

    वक़्त कहता है हमें दूर ही रहना होगा
    हम को हर हाल में मजबूर ही रहना होगा
    Read Full
    Chandrabhan Khayal
    Share
    7
    0 Likes
    दिल पहाड़ों पर चला जाए कि मैदानों में हो
    भीड़ में लोगों की या ख़ाली शबिस्तानों में हो

    शोर फिर भी तेज़ तूफ़ानों की सूरत हर घड़ी
    तोड़ता रहता है ख़ल्वत-ख़्वाह सीनों का जुमूद

    रेज़ा रेज़ा हो गए मेरी तरह कितने वजूद
    अब नहीं मुमकिन किसी सहरा में मजनूँ का वरूद

    ना-तवाँ शख़्सियतें बर्क़ी तवानाई लिए
    रात के काले बदन को चाट कर हैं मुतमइन

    जल रहा है हर शजर इस शहर का अब रात दिन
    उड़ रहे हैं हाथ से तोतों की सूरत साल-ओ-सिन

    रौशनी का रंग जैसे कुछ समझ आता नहीं
    शहर की तहज़ीब का रुख़ किस तरफ़ है क्या पता

    आदमी सादा है या ख़ंजर-ब-कफ़ है क्या पता
    किस लिए ये शोर-ए-मोहमल सफ़-ब-सफ़ है क्या पता

    मैं ने हर अंदाज़ से समझा है सारे शहर को
    शहर जो ख़्वाबों के जंगल के सिवा कुछ भी नहीं

    उम्र सारी छीन कर जिस ने दिया कुछ भी नहीं
    जैसे मेरे वास्ते बाक़ी रहा कुछ भी नहीं

    अपने गालों पर तमाँचा जड़ के ख़ुश हो जाऊँ में
    आज रौशन क़ुमक़ुमों के बीच जागा ये शुऊ'र

    यूँँ तो हर मौसम के चेहरे पर नुमायाँ हैं सुतूर
    इक परिंदा तक नहीं लेकिन हवा में दूर दूर

    मछलियाँ छत पर सिखाने के लिए जब ख़्वाहिशें
    सीढ़ियों पर पाँव रखती हैं तो आ जाती है चील

    ठोंक दी जाएगी अब शायद सभी ज़ेहनों में कील
    उठ रही है हर तरफ़ जलते अँधेरों की फ़सील

    गेरुआ कपड़ों में लिपटा ज़र्द मुस्तक़बिल मुझे
    मशवरा देता रहेगा और मैं मर जाऊँगा
    Read Full
    Chandrabhan Khayal
    Share
    6
    0 Likes
    क़रीब-ए-सुब्ह सदा-ए-शिकस्त-ए-जाँ उभरी
    लबों का ज़हर अचानक पिघल गया आख़िर

    सुकूत-ए-जिस्म लहू पीते पीते चौंक उठा
    ये कौन शब की तमाज़त से जल गया आख़िर

    कराहता सा उठा कोई टूटता पैकर
    सियाहियों में सुलगता हुआ धुआँ जैसे

    झटक के दौर हुई बिस्तरों से उकताहट
    लिपट गया हो कोई साँप ना-गहाँ जैसे

    अज़ाब-ए-रूह मकानों का दर्द चाटेगा
    बढ़ेंगे शहर-ए-तमन्ना की सम्त सब साए

    कशा-कशों के समुंदर में डुबकियाँ लेते
    हर एक ज़ात की मौजूदीयत से उकताए

    घरों में क़ैद दर-ओ-बाम की हर इक उलझन
    गली गली के लबों से लिपट रही होगी

    तबीअतों को सँभाले हुए धुएँ की लकीर
    वरक़ किताब-ए-नफ़स के उलट रही होगी

    रहेगा यूँँ ही सरों पर इ'ताब का सूरज
    इसी तरह से बसर होते जाएँगे दिन-रात
    कलेजा मुँह में रखे और सीने पर पत्थर
    गुज़ार देंगे गुज़रते हुए सभी सदमात
    Read Full
    Chandrabhan Khayal
    Share
    5
    0 Likes
    आज फिर दर्द उठा दिल के निहाँ ख़ाने में
    आज फिर लोग सताने को चले आएँगे
    आज फिर कर्ब के शो'लों को हवा दूँगा मैं
    और कुछ लोग बुझाने को चले आएँगे
    आग से आग बुझी है न बुझेगी लेकिन
    दर्द को आग के दरिया में उतरना होगा
    आग और दर्द के मेआ'र परखने के लिए
    इन अँधेरों की फ़सीलों से गुज़रना होगा
    मैं अँधेरों की रिफ़ाक़त से नहीं हूँ बेज़ार
    शाम-ए-तन्हाई अँधेरा भी भला लगता है
    हैफ़ सद हैफ़ कि मुंकिर था ज़माना जिस का
    आज वो जुर्म मकानों में हुआ लगता है
    लाख कमरे को टटोला भी मगर कुछ न मिला
    फ़र्श पर ख़ून की दो-चार लकीरों के सिवा
    जंग और ज़ुल्म के असरार निहाँ ऐ ज़िंदाँ
    जान पाएगा भला कौन असीरों के सिवा
    दर्द दिल है कि भटकती हुई रूहों का जलाल
    क़त्ल हो कर भी धड़कता है जो वीरानों में
    मैं सुलगता ही रहा और वो अंदाज़-ए-जुनूँ
    छुप गया आग लगा कर मिरे अरमानों में
    Read Full
    Chandrabhan Khayal
    Share
    4
    0 Likes
    सोख़्ता-जाँ सोख़्ता-दिल
    सोख़्ता रूहों के घर में
    राख गर्द-ए-आतिशीं शोलों के साए
    नक़्श हैं दीवारों पर मफ़रूक़ चेहरे
    लौट चलिए अपने सब अरमान ले कर

    झूट है गुज़रा ज़माना
    और किसी उजड़े क़बीले की भटकती रूह शायद
    अपने मुस्तक़बिल का धुँदला सा तसव्वुर
    बहर-ए-ग़म के दरमियाँ है
    एक काले कोह की मानिंद ये इमरोज़ अपना
    कोह जिस पर रक़्स करते हैं सितम-ख़ुर्दा तमन्नाओं के आसेब
    लौट चलिए
    अपने सब अरमान ले कर
    सोचिए तो
    यूँँ अबस आतिश-कदों में क्यूँँ जलें दिल
    क्यूँँ रहें हर वक़्त सीनों पर चटानें
    देखिए तो
    चंद लुक़्में कुछ किताबें
    एक बिस्तर एक औरत
    और किराए का ये ख़ाली तंग कमरा
    आज अपनी ज़ीस्त का मरकज़ हैं लेकिन
    तीरगी का ग़म इन्हें भी खा रहा है
    चार जानिब ज़हर फैला जा रहा है
    लौट चलिए
    अपने सब अरमान ले कर
    अपने सब पैमान ले कर
    जिस्म ले कर जान ले कर
    Read Full
    Chandrabhan Khayal
    Share
    3
    0 Likes
    मुझ से मिल कर ख़ुद को क्या पाएगा तू
    और तन्हा हो के रह जाएगा तू

    ये ठिठुरती धूप है इस धूप में
    कैसे अपना ख़ून गर्माएगा तू

    हड्डियों का दर्द पीना है तो पी
    वर्ना सारी उम्र पछताएगा तू

    साँप के बिल में न कर अमृत तलाश
    यूँँ तो ख़ुद को भी गँवा आएगा तू

    तेरी परछाईं सिमटती जाएगी
    जैसे जैसे फैलता जाएगा तू

    तेरा पत्थर जिस्म हो जाएगा चूर
    जब किसी शीशे से टकराएगा तू

    यूँँ न घोंट उन संग-रेज़ो के गले
    ख़ुद शिकार-ए-संग हो जाएगा तू
    Read Full
    Chandrabhan Khayal
    Share
    2
    download-v1
    Download Image
    0 Likes
    हो न हो आस-पास है कोई
    मेरे जितना उदास है कोई

    सोचता हूँ तो और बढ़ती है
    ज़िंदगी है कि प्यास है कोई

    हादिसा एक भी नहीं गुज़रा
    बे-सबब बद-हवा से है कोई

    फिर परिंदे शजर से बिछड़े हैं
    फिर से तस्वीर-ए-यास है कोई

    अपनी उर्दू तो लोक भाषा है
    इस से क्यूँँ ना-शनास है कोई
    Read Full
    Chandrabhan Khayal
    Share
    1
    download-v1
    Download Image
    0 Likes
whatsapp Get Shayari on your Whatsapp
Munawwar RanaMunawwar RanaNadir ArizNadir ArizAnwar TabanAnwar TabanDilawar Ali AazarDilawar Ali AazarZia MazkoorZia MazkoorAhmad Kamal ParvaziAhmad Kamal ParvaziSiraj Faisal KhanSiraj Faisal KhanAmeer QazalbashAmeer QazalbashBehzad LakhnaviBehzad LakhnaviAalok ShrivastavAalok Shrivastav