Danish Aziz

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Danish Aziz shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Danish Aziz's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
हो जाएँ किसी के जो कभी यार मुनाफ़िक़
समझो कि हुए हैं दर-ओ-दीवार मुनाफ़िक़

बन जाता है कैसे कोई सालार मुनाफ़िक़
ये बात समझने को है दरकार मुनाफ़िक़

मुमकिन था कभी उन को मैं ख़ातिर में न लाता
होते जो मुक़ाबिल मेरे दो-चार मुनाफ़िक़

इन को किसी बाज़ार से लाना नहीं पड़ता
यारों में ही मिल जाते हैं तय्यार मुनाफ़िक़

नापैद हुआ जाता है इख़्लास यहाँ पर
सरदार मुनाफ़िक़ है सर-ए-दार मुनाफ़िक़

जो शख़्स मुनाफ़िक़ है मुनाफ़िक़ ही रहेगा
इक बार मुनाफ़िक़ हो या सौ बार मुनाफ़िक़

सच्चाई ज़बाँ काट के चुप-चाप खड़ी है
शोहरत की बुलंदी पे हैं अख़बार मुनाफ़िक़

लिक्खा है मुनाफ़िक़ ने मुनाफ़िक़ का फ़साना
इस वास्ते रक्खे हैं ये किरदार मुनाफ़िक़

जिस शहर की बुनियाद मुनाफ़िक़ ने हो रक्खी
क़ाएम वहाँ हो जाती है सरकार मुनाफ़िक़

मुख़्लिस हैं जो खुल कर मेरी ताईद करेंगे
भड़केंगे ये सुन कर मेरे अशआ'र मुनाफ़िक़

'दानिश' ये हक़ीक़त है भले मानो न मानो
इख़्लास का तय करते हैं में'यार मुनाफ़िक़
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Danish Aziz
हो जाएँ किसी के जो कभी यार मुनाफ़िक़
समझो कि हुए हैं दर-ओ-दीवार मुनाफ़िक़

बन जाता है कैसे कोई सालार मुनाफ़िक़
ये बात समझने को है दरकार मुनाफ़िक़

मुमकिन था कभी उन को मैं ख़ातिर में न लाता
होते जो मुक़ाबिल मेरे दो-चार मुनाफ़िक़

इन को किसी बाज़ार से लाना नहीं पड़ता
यारों में ही मिल जाते हैं तय्यार मुनाफ़िक़

नापैद हुआ जाता है इख़्लास यहाँ पर
सरदार मुनाफ़िक़ है सर-ए-दार मुनाफ़िक़

जो शख़्स मुनाफ़िक़ है मुनाफ़िक़ ही रहेगा
इक बार मुनाफ़िक़ हो या सौ बार मुनाफ़िक़

सच्चाई ज़बाँ काट के चुप-चाप खड़ी है
शोहरत की बुलंदी पे हैं अख़बार मुनाफ़िक़

लिक्खा है मुनाफ़िक़ ने मुनाफ़िक़ का फ़साना
इस वास्ते रक्खे हैं ये किरदार मुनाफ़िक़

जिस शहर की बुनियाद मुनाफ़िक़ ने हो रक्खी
क़ाएम वहाँ हो जाती है सरकार मुनाफ़िक़

मुख़्लिस हैं जो खुल कर मेरी ताईद करेंगे
भड़केंगे ये सुन कर मेरे अशआ'र मुनाफ़िक़

'दानिश' ये हक़ीक़त है भले मानो न मानो
इख़्लास का तय करते हैं मेआ'र मुनाफ़िक़
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Danish Aziz
हो जाएँ किसी के जो कभी यार मुनाफ़िक़
समझो कि हुए हैं दर-ओ-दीवार मुनाफ़िक़

बन जाता है कैसे कोई सालार मुनाफ़िक़
ये बात समझने को है दरकार मुनाफ़िक़

मुमकिन था कभी उन को मैं ख़ातिर में न लाता
होते जो मुक़ाबिल मेरे दो-चार मुनाफ़िक़

इन को किसी बाज़ार से लाना नहीं पड़ता
यारों में ही मिल जाते हैं तय्यार मुनाफ़िक़

नापैद हुआ जाता है इख़्लास यहाँ पर
सरदार मुनाफ़िक़ है सर-ए-दार मुनाफ़िक़

जो शख़्स मुनाफ़िक़ है मुनाफ़िक़ ही रहेगा
इक बार मुनाफ़िक़ हो या सौ बार मुनाफ़िक़

सच्चाई ज़बाँ काट के चुप-चाप खड़ी है
शोहरत की बुलंदी पे हैं अख़बार मुनाफ़िक़

लिक्खा है मुनाफ़िक़ ने मुनाफ़िक़ का फ़साना
इस वास्ते रक्खे हैं ये किरदार मुनाफ़िक़

जिस शहर की बुनियाद मुनाफ़िक़ ने हो रक्खी
क़ाएम वहाँ हो जाती है सरकार मुनाफ़िक़

मुख़्लिस हैं जो खुल कर मेरी ताईद करेंगे
भड़केंगे ये सुन कर मेरे अशआ'र मुनाफ़िक़

'दानिश' ये हक़ीक़त है भले मानो न मानो
इख़्लास का तय करते हैं मेआ'र मुनाफ़िक़
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Danish Aziz
हो जाएँ किसी के जो कभी यार मुनाफ़िक़
समझो कि हुए हैं दर-ओ-दीवार मुनाफ़िक़

बन जाता है कैसे कोई सालार मुनाफ़िक़
ये बात समझने को है दरकार मुनाफ़िक़

मुमकिन था कभी उन को मैं ख़ातिर में न लाता
होते जो मुक़ाबिल मिरे दो-चार मुनाफ़िक़

इन को किसी बाज़ार से लाना नहीं पड़ता
यारों में ही मिल जाते हैं तय्यार मुनाफ़िक़

नापैद हुआ जाता है इख़्लास यहाँ पर
सरदार मुनाफ़िक़ है सर-ए-दार मुनाफ़िक़

जो शख़्स मुनाफ़िक़ है मुनाफ़िक़ ही रहेगा
इक बार मुनाफ़िक़ हो या सौ बार मुनाफ़िक़

सच्चाई ज़बाँ काट के चुप-चाप खड़ी है
शोहरत की बुलंदी पे हैं अख़बार मुनाफ़िक़

लिक्खा है मुनाफ़िक़ ने मुनाफ़िक़ का फ़साना
इस वास्ते रक्खे हैं ये किरदार मुनाफ़िक़

जिस शहर की बुनियाद मुनाफ़िक़ ने हो रक्खी
क़ाएम वहाँ हो जाती है सरकार मुनाफ़िक़

मुख़्लिस हैं जो खुल कर मेरी ताईद करेंगे
भड़केंगे ये सुन कर मेरे अशआ'र मुनाफ़िक़

'दानिश' ये हक़ीक़त है भले मानो न मानो
इख़्लास का तय करते हैं मेआ'र मुनाफ़िक़
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Danish Aziz
कहा था तुम से न प्यार करना वही किया ना
न लफ़्ज़ बुनना न शे'र कहना वही किया ना

ये तेरा ख़ूँ तक निचोड़ लेंगे कहा था तुझ से
न सुर्ख़ फूलों के पास जाना वही किया ना

कहा था तोहफ़े ख़ुतूत सारे छुपा के रखना
कहा था सब को न ये दिखाना वही किया ना

कहा था चाहत से दूर रहना ये मार देगी
कहा था दिल की न एक सुनना वही किया ना

परिंद तुम पर हँसा करेंगे कहा था तुम से
न तुम दरख़्तों पे नाम लिखना वही किया ना

ये टूट जाएँ तो साँस लेना मुहाल ठहरे
कहा था तुम से न ख़्वाब बुनना वही किया ना

कहा था बातों में तेज़ है वो सँभल के रहना
न उस का हरगिज़ यक़ीन करना वही किया ना

ज़हीन तो हो मगर ज़माना-शनास कम हो
तुम्हें कहा था न इश्क़ करना वही किया ना

लुटा पिटा है फ़रेब देगा ख़याल करना
कभी न 'दानिश' की बात सुनना वही किया ना
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Danish Aziz
वो किसी और से मिला होगा
दिल ये कहता है वाहिमा होगा

मेरे दिल में धमाल पड़ती है
लोग शक में कि आरिज़ा होगा

उस की यारो ख़बर ही ले आओ
कोई दरपेश मसअला होगा

पाँव टिकता नहीं ज़मीं पर क्यूँ
ग़ौर से देख आबला होगा

ख़ामुशी को जवाब मत समझो
ऐन मुमकिन न कुछ सुना होगा

तुम जिसे काएनात कहते हो
यार पानी का बुलबुला होगा

अब ख़ुदा को है फ़ैसला करना
वो तिरा होगा या मिरा होगा

जाओ दुनिया मैं कुछ नहीं कहता
रोज़-ए-महशर ही सामना होगा

ख़ामुशी को ज़बान कहते हैं
एक दिन इस का तर्जुमा होगा

कुछ फ़रिश्ते हैं सामने मेरे
अब तो हर हाल मा'रका होगा

तुम जिसे इश्क़ जान बैठे हो
उन का मुमकिन है मश्ग़ला होगा

लौह-ए-महफ़ूज़ पर जो लिक्खा है
उस से हट कर भी फ़ैसला होगा

सोच लो देख-भाल लो 'दानिश' इश्क़ होगा तो रतजगा होगा
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Danish Aziz
बिखरा पड़ा था जा-ब-जा कचरा वजूद का
हम छोड़ आए उस गली मलबा वजूद का

हर रोज़ माँग माँग के लेता हूँ साँस भी
बढ़ता ही जा रहा है ये क़र्ज़ा वजूद का

कितनी शिकस्त-ओ-रेख़्त हुई कुछ नहीं पता
मुझ को मिला नहीं अभी क़ब्ज़ा वजूद का

ताज़ा हवा न रौशनी ना बाम-ओ-दर न छत
मुझ को समझ न आ सका नक़्शा वजूद का

इक उम्र हो गई उसे ख़ाली पड़े हुए
बिगड़ा हुआ है इस लिए हुलिया वजूद का

कुछ कड़वे घूँट चाहिएँ हर रात उस को अब
यूँँ और बढ़ गया है ये ख़र्चा वजूद का

मेरे सबब ये ख़ाल-ओ-ख़द उस के बिगड़ गए
सुनता हूँ सुब्ह शाम ये ता'ना वजूद का

तुम ही बताओ कैसे चला उस का सिलसिला
मुझ को तो मिल सका नहीं शजरा वजूद का

इक शे'र-फ़हम शख़्स की ख़्वाहिश पे दोस्तो
लो हम ने लिख दिया है ये नौहा वजूद का

जूँ जूँ मैं सोचता हूँ तख़य्युल में उस का लम्स
कुछ और बढ़ता जाता है नश्शा वजूद का

मेरी तो एक बात भी सुनता नहीं ये दिल
हाथों में अब नहीं रहा बच्चा वजूद का

'दानिश' मैं तंग आ गया इस बद-मिज़ाज से
सँभले नहीं सँभलता है ग़ुस्सा वजूद का
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Danish Aziz
पगडंडी लग रही थी पहाड़ों के दरमियाँ
निकली हुई थी माँग यूँँ बालों के दरमियाँ

पहले तकल्लुफ़ात सभी बरतरफ़ हुए
फिर गुफ़्तुगू शुरूअ' हुई आँखों के दरमियाँ

हिज्र-ओ-फ़िराक़ और ये तन्हाई मार दे
वक़्फ़ा अगर न दिन का हो रातों के दरमियाँ

सीने पे हाथ क्या रखा धड़कन सँभल गई
हिचकी सी एक क़ैद थी साँसों के दरमियाँ

कम-बख़्त सब के सामने ले दे न तेरा नाम
मैं ने ज़बान दाब ली दाँतों के दरमियाँ

क़ाएम है उस के दम से ही दम-ख़म अना ग़ुरूर
सर नाम की जो चीज़ है शानों के दरमियाँ

पहले मैं बात कर लूँ ज़रा ग़म-शनास की
तेरा भी होगा तज़्किरा शे'रों के दरमियाँ

कमज़ोर सी नहीफ़ सी बुलबुल के वास्ते
घमसान की लड़ाई थी चीलों के दरमियाँ

सादा-दिली तो देखिए 'दानिश-अज़ीज़' की
इक घर बना रहा है मकानों के दरमियाँ
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Danish Aziz
अगरचे उस ने लिखा हुआ है जहान-ए-फ़ानी में मार देना
मकान वाले से इल्तिजा है कि ला-मकानी में मार देना

मिरे अज़ीज़ो मैं जा रहा हूँ मिरी वसिय्यत को याद रखना
जो मुझ सा कोई भी एक देखो उसे जवानी में मार देना

मुझे है मालूम ऐ मुसन्निफ़ कि मेरा किरदार सानवी है
जहाँ इज़ाफ़ी लगे तुम्हें ये मुझे कहानी में मार देना

मैं जानता हूँ कि ज़ोफ़-ए-पीरी तो छीन लेता है बोलना भी
ज़बाँ में लुक्नत से पेशतर ही मुझे रवानी में मार देना

उन्हें बुढ़ापे में छोड़ना मत नहीफ़ ख़्वाबों को तोड़ना मत
ज़ईफ़ माँ बाप को न तुम उन की ज़िंदगानी में मार देना

मुझे तुम्हारे सितम की निस्बत करम तुम्हारा अज़ीज़-तर है
सो दश्त-ए-ग़म से बचा के सहरा-ए-मेहरबानी में मार देना

अगर ये डर है कि आस्तीं पर मिरे लहू के निशान होंगे
तुम्हें सुहूलत मैं दे रहा हूँ कि मुझ को पानी में मार देना

सभी मोहब्बत की बात करते हैं मैं मोहब्बत निभा रहा हूँ
सो मारना हो तो अपने 'दानिश' को जुर्म-ए-सानी में मार देना
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Danish Aziz
मुझ को थपक थपक के सुलाता रहा चराग़
पहलू में रात भर मिरे बैठा रहा चराग़

कहता रहा कि रात ये कितनी हसीन है
तीरा-शबी का गिर्या भी करता रहा चराग़

सूरज का एक बार फ़क़त नाम क्या लिया
मुझ से तमाम रात ही लड़ता रहा चराग़

उस को मिरी शिकस्त की इतनी ख़ुशी हुई
हाथों पे हाथ मार के हँसता रहा चराग़

मैं उस की ज़र्द लौ में ख़ुदा देखता रहा
कमरे में रात भर मिरे जलता रहा चराग़

तब तक मिरे क़लम ने फ़क़त रौशनी लिखी
जब तक हथेली पर मिरी लिखता रहा चराग़

पहलू में उस के कल तिरी तस्वीर थी पड़ी
ग़ज़लें तिरे जमाल पे कहता रहा चराग़

आँखें मिरी भी सुर्ख़ थीं वो भी बुझा बुझा
यूँँ मेरे साथ साथ ही रोता रहा चराग़

मैं उस के पास बैठ के कहता रहा ग़ज़ल
और पूरे इंहिमाक से सुनता रहा चराग़

कल उस के साथ मेरी बड़ी गुफ़्तुगू हुई
मेरी कहानी सुन के सिसकता रहा चराग़

तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ात का मीसाक़ जब हुआ
मेरे और उस के दरमियाँ बैठा रहा चराग़

जाने हवा ने क्या कहा कानों में उस के कल
'दानिश' तमाम रात मचलता रहा चराग़
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Danish Aziz