Iftikhar Jalib

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Iftikhar Jalib shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Iftikhar Jalib's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Nazm
रौशन रौशन रौशन
आँखें यूँ मरकूज़ हुई हैं जैसे मैं ही मैं हूँ
मुझ में ला-तादाद फ़साने और मआनी हैं
मैं सद-हा असरार छुपाए फिरता हूँ
मैं ख़ुश-क़िस्मत हूँ मेरे साथ जहान-ए-रंग-ओ-रानाई है
और दरीचा-बंद निहाँ-ख़ानों से रूह-ए-यज़्दाँ की ख़ुश्बू उठती है
मेरा सर ओ मशाम मोअत्तर करती है
और मिरी तक़दीर जहाँ पर ख़ल्क़ हुई है
जो अरमान किसी के दिल में है मैं उस की ख़ुश्बू हूँ
वा-हसरत का अर्ज़ ओ समा में फैला नग़्मा
जब महबूब तलक जा पहुँचे
तो फिर मैं आवाज़ नहीं रहता हूँ
और न शिरयानों का बहता ख़ून-ख़राबा
बल्कि लफ़्ज़-ए-मुतलक़ बन जाता हूँ

आँखें यूँ मरकूज़ हुई हैं जैसे मैं ही मैं हूँ और नहीं है कोई
सच्ची बात मगर है इतनी
मैं मुरदार समुंदर हूँ
एहसास ज़ियाँ का झोंका है
आँखें बोल नहीं सकती हैं
और बदन बीनाई से महरूम हुआ है
लेकिन मैं तो अब तक ख़्वाब-ज़दा तस्वीरें देख रहा हूँ
और समुंदर के पर्बत पर ठहरा जंगल
बीते गीतों से पुर जंगल
अज़ली ख़ामोशी के हाले में थर-थर काँप रहा है
सदियाँ साए शोख़ फ़सीलें आमन्ना सद्दक़ना
ऐ-लो! सूरज चाँद सितारे धरती के सीने पर उतरे
मेरी राहगुज़र पर बिखरे
हल्की मद्धम और मुसलसल हरकत
मंज़िल फूल कँवल का फूल अदम के बहर-ए-बे-पायाँ में
तन्हा झूले
बाहर पर मरकूज़ निगाहों से मख़्फ़ी लफ़्ज़-ए-मुतलक़
तन्हा और उदास कँवल पर झिलमिल झिलमिल फूट बहा
मौहूम रिदा-ए-कोह-ओ-दश्त-ओ-दमन
दुनिया-ए-मन-ओ-तू पर छाई
फीकी फीकी हो कर फैल गई धूल बनी
अपना गाँव, गोरी के पाँव तक धुँदलाए
फैली रौशन और निराली धुँद, और धुँद और धुँद
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Iftikhar Jalib
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फटते इरादे यक़ीन मुसीबत पाँव धुलाए
चश्मा कि होंट शबीह-ए-लुआब मयस्सर रात अनोखा सानेहा हो जाएगा
मैले कँवल के फूल डुबोता लिपट लिपट कर चूमता पानी, पानी पानी
नदामत से मग़्लूब ख़राबी: मद्द-ओ-जज़्र मौजूद तबीअत का तख़रीब तमाशा
मुराजअत आँखों से ओझल छूती बहाती बे-तरतीब अज़ाब है
हरी-भरी बेचारगी कैसे? अक्स-ए-शबाहत पंखुड़ियों का
वो जो इरादे की तरकीब नहीं पा सकता लरज़ रहा है
फूल तशद्दुद ख़ौफ़ में ग़र्क़-ए-हरारत डूबती उभरती पतियाँ
केंचुली उतरे तो बात बने मैं कह दूँ? कर गुज़रूँ?
आसाब तशन्नुज फैलती बे-रुख़ बातों की तरदीद-ए-क़यामत कर भी चुको
ये हादसा दायरा सा ये सिमटता फैलता सरपट भागते क़दमों की लू पर जल-भुन राख हो
शोला थिरकता रीढ़ की हड्डी से मग़्ज़ के हुक्म-ए-सलासिल चाटता
दिन पाने की लग़्ज़िश कर ले कर ही ले मजबूरी आ लेती है
चौ-गर्द की गर्दिश राख क़रीने की यकजाई तमसील-ए-ब-ज़ाहिर की ताईद में रखती है
उँगलियाँ उँगलियाँ, बातें बातें, पसीना पसीना, बाक़ी बाक़ी
और बेचारगी
ताहम तो ये तयक़्क़ुन तर्क-ए-तग़ाफ़ुल ठहरे
क़ौल क़यामत आने के जतन करे तक़रीब-ए-तमाशा ढूँडे
छुपी रहे, तड़पाए, तड़पे
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