Lankesh Gautam

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@lankeshgautam22

Lankesh Kumar Jatava shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Lankesh Kumar Jatava's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
  • Nazm
उम्मीद कर रहे हैं यही शाइरी से हम
कोई क़दीम बात कहें ताज़गी से हम

हम ने गँवा दी उम्र जिसे ढूँढते हुए
क्यूँ तंग आ चुके हैं उसी ज़िंदगी से हम

तुम ने सही कहा ये कोई ज़िंदगी है क्या
कल रात कह रहे थे यही ख़ुदकुशी से हम

क्या है जो तुझ को जानने में भूल हो गई
ख़ुद को भी जानते नहीं अब तक सही से हम

अंधा बना दिया है तेरे नूर ने मुझे
आँखें बचा के चल रहे थे रौशनी से हम

तुम को नहीं ख़बर प मुसलसल उदास हैं
सन् दो हज़ार बीस की उस फ़रवरी से हम

बीमार को बना दिया ना-क़ाबिल-ए-इलाज
अच्छे नहीं हुए तेरी चारागरी से हम

वैसे तो मुझ को तुम से उदासी ही चाहिए
पर सच कहें तो थक चुके हैं बेदिली से हम

अब इश्क़ के सिवा हमें कुछ भी न चाहिए
उकता गए हैं दोस्त तेरी दोस्ती से हम

बातें भले कठोर हैं लहजे में है मिठास
सच बात बोलते हैं बड़ी सादगी से हम

तुम ही नहीं हो जॉन याँ हम भी अजीब हैं
ख़ुद को तबाह कर के ख़फ़ा हैं सभी से हम
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Lankesh Gautam
ऐसा नहीं है यार कि ख़ल्वत का दुख नहीं
दरअस्ल मुझ को अब तेरी फ़ुर्क़त का दुख नहीं

उसको कभी न देना ग़म-ए-हिज्र का हिसाब
जिसको ज़रा भी तर्क-ए-मुहब्बत का दुख नहीं

क्या बेसबब ही हर कोई करता है ख़ुदकुशी
तो क्या किसी का दुख भी क़यामत का दुख नहीं

छतरी नहीं मिली उसे इसका है मुझ को दुख
बारिश में घर की टूट चुकी छत का दुख नहीं

तुझ ऐसे बद-मिज़ाज सितमगर के बावुजूद
मुझ को किसी भी तौर मुहब्बत का दुख नहीं

जाओ मियाँ ये हिज्र मनाओ ख़ुशी ख़ुशी
दो चार दिन का दुख है ये मुद्दत का दुख नहीं

मुझको मेरी बिगड़ती तबीअत के बावुजूद
इन बे-हिसाब सिगरेटों की लत का दुख नहीं

होठों को तेरे जिस्म की आदत का दुख तो है
साँसों को तेरी ज़ुल्फ़ की क़ुर्बत का दुख नहीं

जितने परिंद जा रहे हैं छोड़ कर वतन
ये सोचते हैं पेड़ को हिजरत का दुख नहीं
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Lankesh Gautam
ऐ यार तुझ को मुझ से मुहब्बत अगर नहीं
पैमान-ए-जावेदाँ से कम-अज़-कम मुकर नहीं

क्या धूप ही में जिस्म जलाना पड़ेगा अब
क्या हिज्र की सड़क पे कोई भी शजर नहीं

मौक़ा है अब भी कस के पकड़ लीजिए ये हाथ
फिर यूँ न कहना इश्क़ मुकम्मल सफ़र नहीं

कैसे कहूँ कि उस को भी मुझ से था कुछ लगाव
उसकी तो मेरे हिज्र में आँखें भी तर नहीं

पूछा था मैंने उम्र गुज़ारोगे मेरे साथ
मुद्दत के बाद उस ने कहा सोच कर नहीं

पहले पिता के अक्स से भी काँपते थे हम
और अब ये हाल है कि किसी का भी डर नहीं

एक आध वारदात तो ऐसी हुई है दोस्त
मैं थक के कह रहा था नहीं रात भर नहीं

मैंने शब-ए-फ़िराक़ में काटा हुआ है हाथ
ख़ूँ बह रहा है और किसी को ख़बर नहीं

मिलने का मन नहीं है मुझे अब किसी से भी
जान-ए-अज़ीज़ आप से तो ख़ासकर नहीं

फिर चोट खा के रास्ते पे गिर पड़ा न तू
सब कह रहे थे ध्यान से 'गौतम' मगर नहीं
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Lankesh Gautam