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Parveen Fana Syed

Top 10 of Parveen Fana Syed

Parveen Fana Syed

Top 10 of Parveen Fana Syed

    वो जिस की आँखों में रत-जगों की बसीरतें हैं
    वो मिश'अल-ए-जाँ से दश्त की ज़ुल्मतों में
    रस्ते बना रहा है
    वो जिस के तन में हज़ारों मेख़ें गड़ी हुई हैं
    कहाँ है शोरीदा-सर मुसाफ़िर
    कि आज ख़ल्क़ उस को ढूँडती है
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    Parveen Fana Syed
    10
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    अजीब है
    दश्त-ए-आगही का सफ़र
    वफ़ा की रिदा में लिपटी
    बरहना क़दमों से चल रही हूँ
    तपे हुए रेगज़ार में भी
    मगर चुभन है न पाँव में कोई आबला है
    थकन का नाम-ओ-निशाँ नहीं है
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    Parveen Fana Syed
    9
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    तुम्हारा दिल
    तजल्लियों के तूर की ज़िया से
    आगही तलक
    रियाज़तों के नूर में गुँधा हुआ
    अमानतों के बार से दबा हुआ
    तुम्हारी रूह के लतीफ़ आईने में
    अपना अक्स ढूँडने
    अक़ीदतों की गर्द से अटी हुई
    अना के पुल-सिरात से गुज़र के आ रही हूँ मैं
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    Parveen Fana Syed
    8
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    हवा किस क़दर तेज़ है
    अजनबी शाम सँवला गई
    वक़्त दोनों गले मिल चुके
    सर पे रक्खो रिदा
    सुन रही हो
    मसाजिद से उठती हुई
    रूह-परवर-सदा
    उठ के देखो तो
    आँगन का दर बंद है
    या खुला
    लेकिन इस वक़्त तन्हा
    खुले सर
    कहाँ जा रही हो
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    Parveen Fana Syed
    7
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    दश्त मेरी ही दुहाई देगा
    फिर मुझे आबला-पाई देगा

    रौशनी रूह तलक आ पहुँची
    अब अंधेरे में दिखाई देगा

    ज़र्द पत्तों का धड़कता हुआ दिल
    ख़ामुशी में भी सुनाई देगा

    तोड़ कर देख तू आईना-ए-दिल
    शहर का शहर दिखाई देगा

    कश्फ़ ओ आगाही के आईने में
    अपना बहरूप दिखाई देगा
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    Parveen Fana Syed
    6
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    दिल जलाया तिरी ख़ुशी के लिए
    या ख़ुद अपनी ही आगही के लिए

    हाथ पर रख के अपनी रूह-ए-तपाँ
    हम चले अपनी रहबरी के लिए

    नूर की महफ़िलों में रहते हैं
    जो तरसते हैं रौशनी के लिए

    कितने आलाम सह गए हम लोग
    एक बे-नाम सी हँसी के लिए

    आब-ए-हैवाँ भी गर मिले तो न लें
    अपने मेआ'र-ए-तिश्नगी के लिए

    फिर कोई क़हर हज़रत-ए-यज़्दाँ
    कोई तहरीक बंदगी के लिए
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    Parveen Fana Syed
    5
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    सोचते हैं तो कर गुज़रते हैं
    हम तो मँझधार में उतरते हैं

    मौत से खेलते हैं हम लेकिन
    ग़ैर की बंदगी से डरते हैं

    जान अपनी तो है हमें भी अज़ीज़
    फिर भी शो'लों पे रक़्स करते हैं

    दिल-फ़िगारों से पूछ कर देखो
    कितनी सदियों में घाव भरते हैं

    जिन को है इंदिमाल-ए-ज़ख़्म अज़ीज़
    आमद-ए-फ़स्ल-ए-गुल से डरते हैं

    छुप के रोते हैं सब की नज़रों से
    जो गिला है वो ख़ुद से करते हैं
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    Parveen Fana Syed
    4
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    चोट नई है लेकिन ज़ख़्म पुराना है
    ये चेहरा कितना जाना-पहचाना है

    सारी बस्ती चुप की धुँद में डूबी है
    जिस ने लब खोले हैं वो दीवाना है

    आओ उस सुक़रात का इस्तिक़बाल करें
    जिस ने ज़हर के घूँट को अमृत जाना है

    इक इक कर के सब पंछी दम तोड़ गए
    भरी बहार में भी गुलशन वीराना है

    अपना पड़ाव दश्त-ए-वफ़ा बे-आब-ओ-गियाह
    तुम को तो दो चार क़दम ही जाना है

    कल तक चाहत के आँचल में लिपटा था
    आज वो लम्हा ख़्वाब है या अफ़साना है
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    Parveen Fana Syed
    3
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    तुझ को अब कोई शिकायत तो नहीं
    ये मगर तर्क-ए-मोहब्बत तो नहीं

    मेरी आँखों में उतरने वाले
    डूब जाना तिरी आदत तो नहीं

    तुझ से बेगाने का ग़म है वर्ना
    मुझ को ख़ुद अपनी ज़रूरत तो नहीं

    खुल के रो लूँ तो ज़रा जी सँभले
    मुस्कुराना ही मसर्रत तो नहीं

    तुझ से फ़रहाद का तेशा न उठा
    इस जुनूँ पर मुझे हैरत तो नहीं

    फिर से कह दे कि तिरी मंज़िल-ए-शौक़
    मेरा दिल है मिरी सूरत तो नहीं

    तेरी पहचान के लाखों अंदाज़
    सर झुकाना ही इबादत तो नहीं
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    Parveen Fana Syed
    2
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    काश तूफ़ाँ में सफ़ीने को उतारा होता
    डूब जाता भी तो मौजों ने उभारा होता

    हम तो साहिल का तसव्वुर भी मिटा सकते थे
    लब-ए-साहिल से जो हल्का सा इशारा होता

    तुम ही वाक़िफ़ न थे आदाब-ए-जफ़ा से वर्ना
    हम ने हर ज़ुल्म को हँस हँस के सहारा होता

    ग़म तो ख़ैर अपना मुक़द्दर है सो इस का क्या ज़िक्र
    ज़हर भी हम को ब-सद-शौक़ गवारा होता

    बाग़बाँ तेरी इनायत का भरम क्यूँ खुलता
    एक भी फूल जो गुलशन में हमारा होता

    तुम पर असरार-ए-फ़ना राज़-ए-बक़ा खुल जाते
    तुम ने एक बार तो यज़्दाँ को पुकारा होता
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    Parveen Fana Syed
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Swapnil TiwariSwapnil TiwariIbrahim AshkIbrahim AshkMirza GhalibMirza GhalibJaved AkhtarJaved AkhtarNazeer AkbarabadiNazeer AkbarabadiAfzal AllahabadiAfzal AllahabadiFaiz Ahmad FaizFaiz Ahmad FaizAnand Raj SinghAnand Raj SinghAbbas TabishAbbas TabishAadil Raza MansooriAadil Raza Mansoori