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अजीब है
दश्त-ए-आगही का सफ़र
दश्त-ए-आगही का सफ़र
वफ़ा की रिदा में लिपटी
बरहना क़दमों से चल रही हूँ
तपे हुए रेगज़ार में भी
मगर चुभन है न पाँव में कोई आबला है
थकन का नाम-ओ-निशाँ नहीं है
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तपे हुए रेगज़ार में भी
मगर चुभन है न पाँव में कोई आबला है
थकन का नाम-ओ-निशाँ नहीं है
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हवा किस क़दर तेज़ है
अजनबी शाम सँवला गई
अजनबी शाम सँवला गई
वक़्त दोनों गले मिल चुके
सर पे रक्खो रिदा
सुन रही हो
मसाजिद से उठती हुई
रूह-परवर-सदा
उठ के देखो तो
आँगन का दर बंद है
या खुला
लेकिन इस वक़्त तन्हा
खुले सर
कहाँ जा रही हो
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सुन रही हो
मसाजिद से उठती हुई
रूह-परवर-सदा
उठ के देखो तो
आँगन का दर बंद है
या खुला
लेकिन इस वक़्त तन्हा
खुले सर
कहाँ जा रही हो
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दिल जलाया तिरी ख़ुशी के लिए
या ख़ुद अपनी ही आगही के लिए
या ख़ुद अपनी ही आगही के लिए
हाथ पर रख के अपनी रूह-ए-तपाँ
हम चले अपनी रहबरी के लिए
नूर की महफ़िलों में रहते हैं
जो तरसते हैं रौशनी के लिए
कितने आलाम सह गए हम लोग
एक बे-नाम सी हँसी के लिए
आब-ए-हैवाँ भी गर मिले तो न लें
अपने मेआ'र-ए-तिश्नगी के लिए
फिर कोई क़हर हज़रत-ए-यज़्दाँ
कोई तहरीक बंदगी के लिए
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सोचते हैं तो कर गुज़रते हैं
हम तो मँझधार में उतरते हैं
हम तो मँझधार में उतरते हैं
मौत से खेलते हैं हम लेकिन
ग़ैर की बंदगी से डरते हैं
जान अपनी तो है हमें भी अज़ीज़
फिर भी शो'लों पे रक़्स करते हैं
दिल-फ़िगारों से पूछ कर देखो
कितनी सदियों में घाव भरते हैं
जिन को है इंदिमाल-ए-ज़ख़्म अज़ीज़
आमद-ए-फ़स्ल-ए-गुल से डरते हैं
छुप के रोते हैं सब की नज़रों से
जो गिला है वो ख़ुद से करते हैं
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चोट नई है लेकिन ज़ख़्म पुराना है
ये चेहरा कितना जाना-पहचाना है
ये चेहरा कितना जाना-पहचाना है
सारी बस्ती चुप की धुँद में डूबी है
जिस ने लब खोले हैं वो दीवाना है
आओ उस सुक़रात का इस्तिक़बाल करें
जिस ने ज़हर के घूँट को अमृत जाना है
इक इक कर के सब पंछी दम तोड़ गए
भरी बहार में भी गुलशन वीराना है
अपना पड़ाव दश्त-ए-वफ़ा बे-आब-ओ-गियाह
तुम को तो दो चार क़दम ही जाना है
कल तक चाहत के आँचल में लिपटा था
आज वो लम्हा ख़्वाब है या अफ़साना है
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तुझ को अब कोई शिकायत तो नहीं
ये मगर तर्क-ए-मोहब्बत तो नहीं
ये मगर तर्क-ए-मोहब्बत तो नहीं
मेरी आँखों में उतरने वाले
डूब जाना तिरी आदत तो नहीं
तुझ से बेगाने का ग़म है वर्ना
मुझ को ख़ुद अपनी ज़रूरत तो नहीं
खुल के रो लूँ तो ज़रा जी सँभले
मुस्कुराना ही मसर्रत तो नहीं
तुझ से फ़रहाद का तेशा न उठा
इस जुनूँ पर मुझे हैरत तो नहीं
फिर से कह दे कि तिरी मंज़िल-ए-शौक़
मेरा दिल है मिरी सूरत तो नहीं
तेरी पहचान के लाखों अंदाज़
सर झुकाना ही इबादत तो नहीं
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काश तूफ़ाँ में सफ़ीने को उतारा होता
डूब जाता भी तो मौजों ने उभारा होता
डूब जाता भी तो मौजों ने उभारा होता
हम तो साहिल का तसव्वुर भी मिटा सकते थे
लब-ए-साहिल से जो हल्का सा इशारा होता
तुम ही वाक़िफ़ न थे आदाब-ए-जफ़ा से वर्ना
हम ने हर ज़ुल्म को हँस हँस के सहारा होता
ग़म तो ख़ैर अपना मुक़द्दर है सो इस का क्या ज़िक्र
ज़हर भी हम को ब-सद-शौक़ गवारा होता
बाग़बाँ तेरी इनायत का भरम क्यूँ खुलता
एक भी फूल जो गुलशन में हमारा होता
तुम पर असरार-ए-फ़ना राज़-ए-बक़ा खुल जाते
तुम ने एक बार तो यज़्दाँ को पुकारा होता
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