रूपम कुमार 'मीत'

रूपम कुमार 'मीत'

@rupam_poetry

रूपम कुमार 'मीत' shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in रूपम कुमार 'मीत''s shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

5

Content

17

Likes

32

Shayari
Audios
  • Sher
  • Ghazal

Sher

इस जहाँ के लिए आँखों में कशिश है ही नहीं मैं किसी और ही मंज़िल का मुसाफ़िर निकला — रूपम कुमार 'मीत'
कैसे महदूद हो दो मिसरों में एक मुफ़लिस की ज़िंदगी का दुख — रूपम कुमार 'मीत'
तैर पाता नहीं था जो लड़का उस को फेंका गया है पानी में — रूपम कुमार 'मीत'
तीसरे दिन हमें मिली ये ख़बर ज़िंदगी चार दिन की होती है — रूपम कुमार 'मीत'
ता-क़यामत अमर नहीं होता मैं सुख़नवर अगर नहीं होता — रूपम कुमार 'मीत'
दिल टूटने का ग़म भी न महसूस कर सके बेहिस बना दिया है ज़माने ने यूँँ हमें — रूपम कुमार 'मीत'
आज तुलसी में पानी दे कर वो चल पड़ा पेड़ काटने के लिए — रूपम कुमार 'मीत'

Ghazal

हुआ है ज़िंदगी जी कर ख़सारा या रसूलुल्लाह नहीं बिछड़ेंगे अब तुम से दुबारा या रसूलुल्लाह दुआ को हाथ जब उट्ठे हमारा या रसूलुल्लाह तो उस दम लब पे हो क़लमा तुम्हारा या रसूलुल्लाह तुम्हारा मैं तुम्हारा मैं तुम्हारा या रसूलुल्लाह दुलारा हूँ दुलारा हूँ दुलारा या रसूलुल्लाह मुयस्सर हो मदीने की ज़ियारत जिस घड़ी हम को हमारे साथ हो कुम्बा हमारा या रसूलुल्लाह तुम्हारे इश्क़ में किस ने गुज़ारी ज़िन्दगी अपनी मेरी जानिब भी कर देना इशारा या रसूलुल्लाह तुम्हारा मर्तबा 'रूपम' के मुँह से हो बयाँ कैसे तुम्हारी शान में क़ुरआँ है सारा या रसूलुल्लाह — रूपम कुमार 'मीत'
मुफ़लिस की बद-दुआ हूँ मुझे मार दीजिए मैं आप इक बला हूँ मुझे मार दीजिए उस से बिछड़ के उस की मुहब्बत की आग में मुद्दत से जल रहा हूँ मुझे मार दीजिए हासिल मुझे करेंगे तो तड़पेंगे उम्र भर मैं दर्द-ए-ला-दवा हूँ मुझे मार दीजिए क्या कुछ न कर चुका हूँ मैं जीने के वास्ते पर अब मैं थक चुका हूँ मुझे मार दीजिए ख़ुद अपनी जान लूँगा तो दोज़ख में जाऊँगा मैं ख़ुल्द चाहता हूँ मुझे मार दीजिए परवाज़ कर न पाएँगे सोहबत में मेरी आप मैं ऐब देखता हूँ मुझे मार दीजिए हर पैदा होने वाले को लाज़िम है इंतिक़ाल इस हक़ से बोलता हूँ मुझे मार दीजिए — रूपम कुमार 'मीत'
अब से झूटा इश्क़ नहीं करना जानाँ और किसी को मत देना धोखा जानाँ जब आँखों को दरिया करने का मन हो तब मेरी रूदाद-ए-ग़म सुनना जानाँ दिन से रात तलक मैं तुम को रोता हूँ तुम भी मुझ को आठ-पहर रोना जानाँ अपने हाथ के कंगन जा पर रखना तुम वाँ पर मेरी ग़ज़लें मत रखना जानाँ तुम रिश्तों में मत ढूँडो ख़ुशियाँ सारी सीखो ख़ुदस मिल कर ख़ुश होना जानाँ आज जला दी वो वाली फ़ोटो जिस में सूट तुम्हारे जिस्म पे था काला जानाँ तुम सेे पहले मैं ख़ुश रहता था लेकिन बा'द तुम्हारे रंज-ओ-ग़म रहता जानाँ चार महीने खेल के दिल को तोड़ दिया मेरा दिल क्या एक खिलौना था जानाँ? हाए! तुम्हारे लब को देख के लगता है तुम ने 'मीत' का ख़ून पिया होगा जानाँ — रूपम कुमार 'मीत'
सच तो ये है, कि किसी से भी सिफ़ारिश नहीं की अपनी परवाज़ पे हम ने कभी बंदिश नहीं की उस की नज़रों में बराबर हैं सभी यकसाँ हैं रब ने मुनकिर पे कभी संग की बारिश नहीं की मेरी मिट्टी को उठा कर ये मेरा कूज़ा-गर शक्ल देने लगा पर चाक ने गर्दिश नहीं की एक ही शहर में हम दोनों का है घर फिर भी हम ने इक दूसरे से मिलने की ख़्वाहिश नहीं की इतने ख़ुद्दार थे हम अपने ही मालिक के हुजूर हाथ फैलाए मगर होंटों ने जुम्बिश नहीं की काग़ज़ी रोटियों से भूख मिटा ली हम ने अपनी ग़ुरबत की कहीं पर भी नुमाइश नहीं की हसरत-ए-दीद का सरमाया बहुत है हम को वक़्त ने तुझ से मिलाने की जो कोशिश नहीं की — रूपम कुमार 'मीत'
ज़मीं भाती नहीं और आसमाँ अच्छा नहीं लगता कहाँ ले जाएँ दिल को ये जहाँ अच्छा नहीं लगता मेरा दम शहर में घुटता है कुछ दुख गाँव में भी हैं यहाँ अच्छा नहीं लगता वहाँ अच्छा नहीं लगता वो अपने हाथ से जुगनू नहीं ऊपर उड़ाता तो सितारों के बिना ये आसमाँ अच्छा नहीं लगता हमारें घर में भी ख़ुशियाँ सभी मौजूद हैं लेकिन हमें बरसात में अपना मकाँ अच्छा नहीं लगता नहीं हो हम-सफ़र जब साथ तब तन्हा मुसाफ़िर को सड़क से हर गुज़रता कारवाँ अच्छा नहीं लगता किसी की चाह में जब से हुए बर्बाद हम को 'मीत' यक़ीं अच्छा नहीं लगता गुमाँ अच्छा नहीं लगता — रूपम कुमार 'मीत'
दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे किया है जो मेरे अपने ने दूसरा न करे उसे है इल्म बिछड़ने से लोग टूटेंगे कभी वो मोतियों को डोर से जुदा न करे बुज़ुर्ग हो गया हूँ ज़िंदगी से इस लिए भी वो देख भाल करे पर मेरी दवा न करे नहीं है ख़ौफ़ समुंदर में डूबने का मुझे मगर यूँँ क़र्ज़ में मरना पड़े ख़ुदा न करे मुहाल है ज़मीं से आसमान तक का सफ़र बुलंदियों पे यूँँ जा कर कोई गिरा न करे मैं झूटी ज़िंदगी से अब नजात चाहता हूँ तवील उम्र की मेरी कोई दुआ न करे ख़ुदा क़ुबूल करे आख़री दुआ ये मेरी वो मेरे बा'द किसी और का बुरा न करे हमें भी हक़ है यहाँ सर उठा के जीने का ज़माना तल्ख़-बयानी से तब्सिरा न करे तुम्हारी ज़ुल्फ़ तो बिखरेगी उँगलियों से मेरी बस इस का ध्यान रहे ये कहीं हवा न करे मैं अपने दिल से तेरा दिल निकाल फेंकूँगा मैं वो नहीं हूँ जो वा'दा करे वफ़ा न करे ये भाग दौड़ भरा शहर है ज़रा ठहरो किसी के वास्ते कोई यहाँ रुका न करे मुक़ाम-ए-फ़ख़्र पे लब से ये बद-दुआ निकली हमारे साथ ज़माना चले ख़ुदा न करे — रूपम कुमार 'मीत'
जब नाम उस का दुश्मन-ए-जानी में आएगा ग़द्दार बनके दोस्त कहानी में आएगा शाइ'र हैं हम ग़ज़ल के हमें शे'र कहने दो हम को मज़ा न क़िस्सा-बयानी में आएगा हर इक गरीब का यहाँ दुख इतना है कि ये इक शे'र के न ऊला-ओ-सानी में आएगा बेटी के हाथ ने मेरी गुड़िया नहीं देखी ये दाग़ मुफ़लिसी की निशानी में आएगा तूफ़ान जितना तेज़ है पानी की सतह पर दरिया भी आज उतनी रवानी में आएगा होंठो से मेरे निकलेगी तब आह दोस्तों जब ख़ून दिल का आँख के पानी में आएगा शानों पे मेरे बच्चे जो बैठेंगे 'मीत' तब "बचपन का दौर फिर से जवानी में आएगा" — रूपम कुमार 'मीत'