वो शह्र-ए-दिल सदा के लिए छोड़ क्या गया
आँखों से मेरी प्यार का मौसम चला गया
उस को ख़बर थी ख़ौफ़ मुझे तीरगी से है
जलते हुए चराग़ तभी तो बुझा गया
आँखों में था मलाल वो रुख़्सत हुआ था जब
मुड़ मुड़ के दूर तक वो मुझे देखता गया
मैं भी मुरीद-ए-क़ैस था ता-अत शिआर था
दिल टूटने के बा'द मैं सहरा में आ गया
आँखों में जिस की 'मीत' मैं रहता था रात दिन
मुझ को वो आज अपनी नज़र से गिरा गया
— रूपम कुमार 'मीत'















