रंज-ओ-ग़म का ये कारवाँ जानाँ
है हमारे ही दरमियाँ जानाँ
हम तो मर भी नहीं सके इक साथ
हो गया इश्क़ राएगाँ जानाँ
दिल मुहल्ले की सब दिवारों पर
नज़्म है अपनी दास्ताँ जानाँ
मेरे सीने पे जो चमकते हैं
तेरे क़दमों के हैं निशाँ जानाँ
सारी दुनिया खँगाल बैठे हैं
अपनी मंज़िल है अब कहाँ जानाँ
आँधियों से जो खौफ़ आने लगे
बंद कर लेना खिड़कियाँ जानाँ
रुख़ ये महताब आँखें नीली हैं
चाँद देखूँ या आसमाँ जानाँ
सात जन्मों का साथ हो अपना
था इसी बात का गुमाँ जानाँ
— रूपम कुमार 'मीत'















