ज़मीं भाती नहीं और आसमाँ अच्छा नहीं लगता

कहाँ ले जाएँ दिल को ये जहाँ अच्छा नहीं लगता

मेरा दम शहर में घुटता है कुछ दुख गाँव में भी हैं
यहाँ अच्छा नहीं लगता वहाँ अच्छा नहीं लगता

वो अपने हाथ से जुगनू नहीं ऊपर उड़ाता तो
सितारों के बिना ये आसमाँ अच्छा नहीं लगता

हमारें घर में भी ख़ुशियाँ सभी मौजूद हैं लेकिन
हमें बरसात में अपना मकाँ अच्छा नहीं लगता

नहीं हो हम-सफ़र जब साथ तब तन्हा मुसाफ़िर को
सड़क से हर गुज़रता कारवाँ अच्छा नहीं लगता

किसी की चाह में जब से हुए बर्बाद हम को 'मीत'
यक़ीं अच्छा नहीं लगता गुमाँ अच्छा नहीं लगता

— रूपम कुमार 'मीत'

More by रूपम कुमार 'मीत'

Other ghazal from the same pen

See all from रूपम कुमार 'मीत' →

Aarzoo Shayari

Shers of aarzoo.

All Aarzoo Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling