दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे

किया है जो मेरे अपने ने दूसरा न करे

उसे है इल्म बिछड़ने से लोग टूटेंगे
कभी वो मोतियों को डोर से जुदा न करे

बुज़ुर्ग हो गया हूँ ज़िंदगी से इस लिए भी
वो देख भाल करे पर मेरी दवा न करे

नहीं है ख़ौफ़ समुंदर में डूबने का मुझे
मगर यूँ क़र्ज़ में मरना पड़े ख़ुदा न करे

मुहाल है ज़मीं से आसमान तक का सफ़र
बुलंदियों पे यूँ जा कर कोई गिरा न करे

मैं झूटी ज़िंदगी से अब नजात चाहता हूँ
तवील उम्र की मेरी कोई दुआ न करे

ख़ुदा क़ुबूल करे आख़री दुआ ये मेरी
वो मेरे बा'द किसी और का बुरा न करे

हमें भी हक़ है यहाँ सर उठा के जीने का
ज़माना तल्ख़-बयानी से तब्सिरा न करे

तुम्हारी ज़ुल्फ़ तो बिखरेगी उँगलियों से मेरी
बस इस का ध्यान रहे ये कहीं हवा न करे

मैं अपने दिल से तेरा दिल निकाल फेंकूँगा
मैं वो नहीं हूँ जो वा'दा करे वफ़ा न करे

ये भाग दौड़ भरा शहर है ज़रा ठहरो
किसी के वास्ते कोई यहाँ रुका न करे

मुक़ाम-ए-फ़ख़्र पे लब से ये बद-दुआ निकली
हमारे साथ ज़माना चले ख़ुदा न करे

— रूपम कुमार 'मीत'

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