जब नाम उस का दुश्मन-ए-जानी में आएगा

ग़द्दार बनके दोस्त कहानी में आएगा

शाइ'र हैं हम ग़ज़ल के हमें शे'र कहने दो
हम को मज़ा न क़िस्सा-बयानी में आएगा

हर इक गरीब का यहाँ दुख इतना है कि ये
इक शे'र के न ऊला-ओ-सानी में आएगा

बेटी के हाथ ने मेरी गुड़िया नहीं देखी
ये दाग़ मुफ़लिसी की निशानी में आएगा

तूफ़ान जितना तेज़ है पानी की सतह पर
दरिया भी आज उतनी रवानी में आएगा

होंठो से मेरे निकलेगी तब आह दोस्तों
जब ख़ून दिल का आँख के पानी में आएगा

शानों पे मेरे बच्चे जो बैठेंगे 'मीत' तब
"बचपन का दौर फिर से जवानी में आएगा"

— रूपम कुमार 'मीत'

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Nigaah Shayari

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