Shivam Ritwik

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@shivamtiwari2025

Shivam Tiwari shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Shivam Tiwari's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
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Sher

इक ज़िन्दगी की आस में इक ज़िन्दगी गुज़र गई — Shivam Ritwik
ख़ुद को हुश्यार समझने वाले इश्क़ नादानियाँ सिखला देगा — Shivam Ritwik
मेरे अंदर मिरी आवाज़ में ही ये आख़िर कौन गाता फिर रहा है — Shivam Ritwik
निरंतर शून्य सा कुछ घट रहा है निरंतर और बढ़ता जा रहा हूँ — Shivam Ritwik
दिल ही हो गर वो पर पास न हो कोई ख़ास भी इतना ख़ास न हो — Shivam Ritwik
हमें पाकर भी इतने दूर क्यूँँ हो मुहब्बत अब भी क्या मशकूर होगी — Shivam Ritwik
मिले हर शख़्स से जगना जगाना क्या किसी से इश्क़ में हासिल गँवाना क्या — Shivam Ritwik
तुझ सेे हाथ मिलाकर किस ने क्या पाया क्या बस तुझ को छू लेना ही सब कुछ है — Shivam Ritwik
बस यही याद है कि अब अब तो कुछ याद ही नहीं — Shivam Ritwik
टूट जाने का नशा है होश भी बेहोश सा मय-क़दे तेरी कहानी देर तक सुनता रहा — Shivam Ritwik
मैं आज भी वही हूँ इक बार दिल में देखो — Shivam Ritwik
ब-राह-ए-रास्त क्यूँँकर मय-कशी को भला इल्ज़ाम क्यूँ दे बेबसी को — Shivam Ritwik
इतनी बड़ी सी दुनिया में इक दुनिया लिए बैठा हूँ — Shivam Ritwik
ज़मीं सरसब्ज़ बर्ग-ओ-गुल से ख़ुशबू कर दिया तेरे इक फोन ने ग़ुस्से को आँसू कर दिया — Shivam Ritwik
मिरे आँसू ज़रा सा तुम भी हँस लो मुहब्बत हाथ पीले कर रही है — Shivam Ritwik
मेरे ग़म की कहानी बन रही है कहानी से वही मशहूर होगी — Shivam Ritwik
पहले जैसे नहीं रहे अब तुम तुम सेे नहीं रहे — Shivam Ritwik
रात यूँँ बिखरी पड़ी है अक्स पूनम सी हसीं तीरगी में ही मज़ा है छू ले दिल कहता रहा — Shivam Ritwik

Ghazal

Nazm

"तमाशा बन के रह गए" लहू की प्यास बुझ सकी न इश्क़ के बाज़ार में तमाशा बन के रह गए हम दहर के दरबार में उम्मीद एक झूठ थी जो उम्र भर चलती रही हयात की क़बा हर एक मोड़ पर जलती रही न जीत की ख़ुशी मिली न हार का मलाल है कि अब हमारी मौत भी एक ज़ीस्त का सवाल है सबक़ वफ़ा का पढ़ के हम फ़ना के दर पे आ गए जो ख़्वाब हमने देखे थे वो राख बन के छा गए कहाँ की ये उम्मीदें हैं कहाँ की हैं नवाज़िशें फ़क़त फ़रेब-ए-दिल रहीं ये इश्क़ की सब ख़्वाहिशें गुनाह-ए-आरज़ू की हमने वो सज़ा है पाई अब कि अपने साये से भी यूँ डर रही तन्हाई अब अजब ये मुंसिफ़ी रही है दिल के कार-ओ-बार में तमाशा बन के रह गए हम दहर के दरबार में न सर पे कोई छत रही न पाँव के तले ज़मीं मगर ये ज़िद कि हम सा कोई सरफिरा यहाँ नहीं चलो कि आज जिस्म की ये बेड़ियाँ उतार दें ये रूह भी तो यार के ही नाम पर हम वार दें गले में आग है दबी ये आँख है मक़ाम-ए-ख़ूँ नज़र में रक़्स कर रहा है मौत का ही इक जुनूँ मज़ा ही कुछ अलग रहा है हार की पुकार में तमाशा बन के रह गए हम दहर के दरबार में कलेजा चीर कर यहाँ तमाशा हम दिखाएँगे हँसेगी ये जो दुनिया हम भी साथ मुस्कुराएँगे जहाँ पे क़त्ल हो चुका है हर हसीं ख़याल का बचा है क्या जवाब अब यहाँ किसी सवाल का दफ़्न हैं हम कब के अपनी हसरतों के ढेर में उजाला ढूँढते रहे हम उम्र भर अंधेर में अजीब लुत्फ़ आ रहा है इश्क़ के बुख़ार में तमाशा बन के रह गए हम दहर के दरबार में — Shivam Ritwik