Tabish Dehlvi

Tabish Dehlvi

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Tabish Dehlvi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Tabish Dehlvi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
धूमें मचाएँ सब्ज़ा रौंदें फूलों को पामाल करें
जोश-ए-जुनूँ का ये आलम है अब क्या अपना हाल करें

दश्त-ए-जाँ में एक ख़ुशी की लहर कहाँ तक दौड़ेगी
वस्ल के इक इक लम्हे को हम क्यूँ कर माह ओ साल करें

जान से बढ़ कर दिल है प्यारा दिल से ज़ियादा जान अज़ीज़
दर्द-ए-मोहब्बत का इक तोहफ़ा किस किस को इरसाल करें

नंग-ए-करम है सोज़-ए-अलम से अहल-ए-दिल की महरूमी
दर्द-ए-इश्क़ मता-ए-जाँ है साहिब कुछ तो ख़याल करें

मौसम बदले फिर भी है आशोब-ए-विसाल-ओ-हिज्र वही
हाल ज़माने का जब ये हो क्या माज़ी क्या हाल करें

रूह की एक इक चोट उभारें दिल का एक इक ज़ख़्म दिखाएँ
हम से हो तो नुमायाँ क्या क्या अपने ख़द्द-ओ-ख़ाल करें

क़र्ज़ भला क्या देगा कोई भीक भी मिलनी मुश्किल है
नादारों की इस बस्ती में किस से जा के सवाल करें

हर इक दर्द को अपना जानें हर इक ग़म को अपनाएँ
ख़्वाह किसी की दौलत-ए-ग़म हो दिल को मालामाल करें

बे-हुनरी को हुनर करे ये अहल-ए-हुनर का दुश्मन है
चर्ख़-ए-कज-रफ़तार है आख़िर 'ताबिश' हम भी ख़याल करें
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Tabish Dehlvi
आग़ाज़-ए-गुल है शौक़ मगर तेज़ अभी से है
यानी हवा-ए-बाग़ जुनूँ-ख़ेज़ अभी से है

जोश-ए-तलब ही मौजिब-ए-दरमाँदगी न हो
मंज़िल है दूर और क़दम तेज़ अभी से है

क्या इर्तिबात-ए-हुस्न-ओ-मोहब्बत की हो उमीद
वो जान-ए-शौक़ हम से कम-आमेज़ अभी से है

तरतीब-ए-कारवाँ में बहुत देर है मगर
आवाज़ा-ए-जरस है कि महमेज़ अभी से है

पहली ही ज़र्ब-ए-तेशा से कोह-ए-गिराँ है चूर
हसरत-मआल सतवत-ए-परवेज़ अभी से है

क्या जाने मय-कशों का हो क्या हश्र सुब्ह तक
साक़ी की हर निगाह दिल-आवेज़ अभी से है

ये इब्तिदा-ए-शौक़ ये पुर-शौक़ दिल मिरा!
इक जाम-ए-आतिशीं है कि लबरेज़ अभी से है

'ताबिश' भरी बहार में कोई बिछड़ गया
अब के चमन में बू-ए-ख़िज़ाँ तेज़ अभी से है
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बहुत जबीन-ओ-रुख़-ओ-लब बहुत क़द-ओ-गेसू
तलब है शर्त-ए-सुकूँ के हज़ार-हा पहलू

जो बे-ख़ुदी है सलामत तो मिल ही जाएगा
बरा-ए-फ़ुर्सत-ए-अंदेशा यार का ज़ानू

हज़ार दश्त-ए-बला हल्क़ा-ए-असर में हैं
मिरा जुनूँ है कि चश्म-ए-ग़ज़ाल का जादू

ये राज़ खोल दिया तेरी कम-निगाही ने
सुकूँ की एक नज़र दर्द के बहुत पहलू

सबा हज़ार करे बू-ए-गुल की आमेज़िश
न दब सकेगी तिरे जिस्म-ए-नाज़ की ख़ुश्बू

इक इज़्तिराब-ए-हसीं है फ़िशार-ए-तंगी-ए-मय
कनार-ए-शौक़ में तू है कि दाम में आहू

बहुत है अहल-ए-बसीरत को एक जल्वा भी
वफ़ूर-ए-तिश्ना-लबी हो अगर तो ख़म है सुबू

जुनूँ और अहल-ए-जुनूँ का वो क़हत है 'ताबिश'
उठा न दश्त से फिर कोई नारा-ए-याहू
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Tabish Dehlvi
एक जल्वा ब-सद अंदाज़-ए-नज़र देख लिया
तुझ को ही देखा किए तुझ को अगर देख लिया

जैसे सर फोड़ के मिल जाएगी ज़िंदाँ से नजात
क्या जुनूँ ने कोई दीवार में दर देख लिया

बाज़ है आज तलक दीदा-ए-हैराँ की तरह
दश्त-ए-वहशत ने किसे ख़ाक-बसर देख लिया

जुर्म-ए-नज़्ज़ारा की पाता है सज़ा दिल अब तक
अहल-ए-दिल देख लिया अहल-ए-नज़र देख लिया

सूरत-ए-नक़्श-ए-क़दम दीदा-ए-मुश्ताक़ हैं हम
जब भी वो आया सर-ए-राहगुज़र देख लिया

यही हसरत है कि वो एक नज़र देख तो ले
और उस ने कभी इस सम्त अगर देख लिया

कहीं पर्दा है तजल्ली कहीं जल्वा है हिजाब
ये तमाशा भी तिरा ज़ौक़-ए-नज़र देख लिया

रोज़ इक ताज़ा ग़म-ए-दहर है नाज़िल 'ताबिश'
एक तूफ़ान-ए-बला ने मिरा घर देख लिया
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सब ग़म कहें जिसे कि तमन्ना कहें जिसे
वो इज़्तिराब-ए-शौक़ है हम क्या कहें जिसे

है जोहद-ए-मुनफ़रिद सबब-ए-कारोबार-ए-दहर
इक इज़्तिराब-ए-क़तरा है दरिया कहें जिसे

नेमत का ए'तिबार है हुस्न-ए-क़ुबूल से
इशरत भी एक ग़म है गवारा कहें जिसे

मिलता नहीं है अहल-ए-जुनूँ का कोई सुराग़
बस एक नक़्श-ए-पा है कि सहरा कहें जिसे

पहले हयात-ए-शौक़ थी अल्लाह-रे इंक़लाब
अब ए'तिबार-ए-ग़म है तमन्ना कहें जिसे

है मेरे काएनात-ए-तसव्वुर का इक फ़रेब
वो जल्वा-ए-ख़याल कि दुनिया कहें जिसे

कुछ कम-निगाहियाँ हैं तजल्ली की आड़ से
ऐसी भी इक निगाह-ए-तमाशा कहें जिसे

तन्हाई-ए-ख़याल से 'ताबिश' ये हाल है
ऐसा कोई नहीं कि हम अपना कहें जिसे
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