पंखा दीवार और खिड़कियों पर नज़र जाती हैरात यूँ ही गुज़रनी थी यूँ ही गुज़र जाती हैइश्क़ ने कौन सी तार जाने कहाँ जोड़ दीदिल कभी भरने लग जाए तो आँख भर जाती है— Yamir Ahsan