देखा था इक ख़्वाब किसी ख़्वाब में
छू लिया था मैं उन्हें आदाब में
हाथ उठाया था वो मेरी तरफ़
देखते मैं रह गया तालाब में
ख़ास है क्या जो मैं सुनाऊँ तुम्हें
यार ही था खेल के ग़र्क़ाब में
हारना था ही नहीं तक़दीर में
सो चला वो जीत कर अहबाब में
सो गया था वो कहीं पर सहरा में
जल गया 'जोहैर' इस अलक़ाब में
— Zohair Ahmad Sahil















