मैं ख़ुद से ही बिछड़ गया सफ़र में कौन था
जो लौट कर भी गुम हुआ बशर में कौन था
दुआएँ घर की रौशनी थीं दिल बुझा हुआ
मिरे ही दिल के साए के असर में कौन था
हिदायतों की बस्ती में मैं रुक नहीं सका
मिरी ही भूलों के किसी हुनर में कौन था
तिरी तलाश में मैं ही सवाल बन गया
मिरे ही हर जवाब के सफ़र में कौन था
जो आइने में था वो भी मैं ही तो था मगर
मिरी ही शक्ल के किसी नज़र में कौन था
— Zohair Ahmad Sahil















