"शा'इरी या बीवी"
है घर इन झड़ते बालों से परेशाँ,
सभी शादी की बस ज़िद कर रहे हैं,
यहाँ मेरी मुहब्बत शा'इरी है,
अगर शादी का दिन तय हो गया तो,
मुहब्बत मुँह बना कर ग़ुस्से में ही,
चली जाएगी मुझ को छोड़कर तो,
न आऊँगा किसी के काम में भी,
मैं तो बस शा'इरी का ही हूँ लोगों,
ये सूरज चाँद से तो दूर रह ले,
मगर बिन रौशनी क्या ही करेगा,
कोई समझाए घर वालों को ये सब,
यही डर खा रहा है मुझ को अब तो,
मेरे घर वाले शादी करवा ही देंगे,
ख़ुदा अगले जनम भी फ़न यही देना,
मुझे बेकस बनाना रखना बेघर,
कोई इक ज़िंदगी शाइ'र रहूँ बस,
मुझे इस बात की चिंता न हो तब,
चुनूँ क्या शा'इरी या बीवी में से,
बिताऊँ ज़िंदगी बस शा'इरी में















