'फ़ुर्सत'
अलसायी सी दुपहरी में
फ़िक्रों की तेज़ धूप से
बचकर
बेफ़िक्री की छाँव में जब
तुम बैठोगे थोड़ी देर
तब सुनना अपने अंदर
गुज़रे सालों से छनकर
नज़्म सी इक बन कर
बचपन के घर
तुम से ये पूछेंगे- यार कहाँ गुम थे
इतने दिन से मिले नहीं
तुम शायद ये बोलोगे
यारों दूर बहुत पड़ते हो
एक जगह फ़ुर्सत में कहीं
बैठा हूँ तब जा कर मैं
अब तुम तक आ पाया हूँ।
— kapil verma















