मेरे दिल में भी इक लड़की रहती थी
मैं था शायर वो मेरी शाईरी थी
जब मैं उसके हुस्न पे ग़ज़लें कहता था
दोनों हाथों से चहरा ढक लेती थी
जब मैं उस सेे हिज्र की बातें करता तो
मेरे होटों पे अँगुली रख देती थी
उसकी रंगत का कैसे इजहार करूँं
ऐसा मानो जैसे असली चाँदी थी
ख़ामोश ही रहती, जब मुझ सेे मिलती थी
लेकिन मेरा फोन पे सर खा जाती थी
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