yaar hone ka zaraa farz nibhaate jaate | यार होने का ज़रा फ़र्ज़ निभाते जाते

  - Aditya

यार होने का ज़रा फ़र्ज़ निभाते जाते
ज़ख़्म अच्छा सा मेरे दिल पे सजाते जाते

शाम होते ही कहाँ डूब चले तुम सूरज
चाँद को रात का रस्ता तो दिखाते जाते

नींद से दूर मैं ये रात गुज़ारूँ कैसे
कुछ दिए ख़्वाब के आँखों में जलाते जाते

छिप गए मुझ सेे बहुत दूर है अच्छा लेकिन
अपने पैरों के निशाँ भी तो मिटाते जाते

लौट आने का कोई झूट ही कहते जाते
जाते जाते कोई उम्मीद जगाते जाते

देखने वाले हो तुम मुझको ख़रीदोगे नहीं
कम से कम दाम ही अच्छे से लगाते जाते

अब के मौसम ने बहुत दर्द दिया है वर्ना
ज़ख़्म पे ज़ख़्म यूँँ हँस कर ही भुलाते जाते

चाहतें जिसकी थी मुझको वो अगर मिल जाता
मौत से मिलने भी हम नाचते गाते जाते

  - Aditya

Bhai Shayari

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