मोहब्बत तू जो करता है वफ़ाएँ क्यूँँ नहीं करता
मेरे ज़ख़्मों की आख़िर तू दवाएँ क्यूँँ नहीं करता
तू मेरा चाहने वाला तो हरगिज़ हो नहीं सकता
अगर है तो मेरे हक़ में दुआएँ क्यूँँ नहीं करता
ये इंसाँ की ख़ता है कि मोहब्बत कर तो लेता है
मोहब्बत को निभाने की ख़ताएँ क्यूँँ नहीं करता
चराग़ों की नुमाइश में ख़लल हर कोई करता है
कोई सूरज बुझाने को हवाएँ क्यूँँ नहीं करता
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