Aditya
Aditya
Ghazal

घटाएँ घिर के आएँ तो तुम्हारी याद आती है

कभी मीरा को गाएँ तो तुम्हारी याद आती है

तुम्हारी याद ने शायद हमारा हाथ थामा है
नगर से दूर जाएँ तो तुम्हारी याद आती है

कभी पेड़ो की छाया में कभी घर की अटारी पर
छुएं हम को हवाएँ तो तुम्हारी याद आती है

बहुत मनहर सी हो ‘विश्वास’ के तुम गीत जैसी हो
जिसे वो गुनगुनाएँ तो तुम्हारी याद आती है

तुम्हारे छूने भर से ही महक उठ्ठीं किताबें भी
जो पढ़ने को उठाएँ तो तुम्हारी याद आती है

सियाही रात से भी पूछ लेना हाल तुम मेरा
जो तारे टिमटिमाएँ तो तुम्हारी याद आती है

किसी के पैर छूने पर किसी का साथ देने पर
जो मिलती हैं दुआएँ तो तुम्हारी याद आती है

सवेरे शाम पूजा अर्चना के बा'द मंदिर में
जो मां मिश्री चढ़ाएँ तो तुम्हारी याद आती है

तुम्हारी याद आती है कभी, तुम क्यूँ नहीं आतीं
तुम्हें जब भी बुलाएँ तो तुम्हारी याद आती है

— Aditya

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