जाने क्या बात थी जो बात अधूरी ही रही
फिर तो उस दिन की मुलाक़ात अधूरी ही रही
गुम गया अब्र कहीं मेरा घर आते आते
मेरे हक में थी जो बरसात अधूरी ही रही
वक़्त-ए-सैलाब जो ख़्वाबों का मकाँ टूट गया
बाद उस दिन के हर इक रात अधूरी ही रही
उड़ गए रंग हवाओं से तसब्बुर के मेरे
और तस्वीर-ए-खयालात अधूरी ही रही
हारने में मेरे दुश्मन ने बहुत जल्दी की
मेरी ख़्वाहिश में बसी मात अधूरी ही रही
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