तन्हाई से काम चलाया करता हूँ
ख़्वाबों की तस्वीर बनाया करता हूँ
ख़ुद को ढूँढ़ रहा हूँ इक मुद्दत से मैं
ढूँढ़ के ख़ुद को ख़ुद में छिपाया करता हूँ
अंदर चुप्पी साधे बैठा रहता हूँ
बाहरस आवाज़ लगाया करता हूँ
इक ख़ामोशी मुझ से बातें करती है
और मैं उस का मन बहलाया करता हूँ
मेरे एहसासों का दरिया ख़ाली है
तो ख़ुद को बारिश में भिगाया करता हूँ
मैं ही दरवाज़े पर दस्तक देता हूँ
मैं ही निकल के बाहर आया करता हूँ
बस आईना ही मेरा इक साथी है
उस को अपने हाल सुनाया करता हूँ
तंग करूँ मैं किस को कोई है ही नहीं
बस दीवारों को ही रुलाया करता हूँ
टेबल लैंप को जब भी नींद नहीं आती
तो मैं उस का सर थपकाया करता हूँ
मेरी किताबें ग़ज़लों की दीवानी हैं
क्यूँकि उन्हें मैं शे’र सुनाया करता हूँ
एक वही है ‘आदी’ जिस का कायल है
जिस को अक्सर गीत बनाया करता हूँ















