लोग हँसते हैं तेरे बच्चों पर
क्यूँ नहीं आता ऐसे मौक़ों पर
तू यहीं लाना चाहता था मुझे
देख मैं आ गया हूँ घुटनों पर
कोई अफ़सर नहीं मैं शाइ'र हूँ
और धब्बा हूँ अपने पुरखों पर
ले के फिरते हैं हम गली गली में
अपनी ही लाश अपने कंधों पर
जो कि जीना मुहाल करते हैं
लोग मरते हैं ऐसे ऐसों पर
कोई जादू है तेरे चेहरे में
कोई पर्दा है मेरी आँखों पर
है ये शर्मिंदगी के हम ने भी
अश्क ज़ाया' किए हैं ग़ैरों पर
— Aditya Singh aadi














