तू चांँद है तो चांँद के धब्बों की तरह मैं
पर चाहता हूँ तुझ को चकोरों की तरह मैं
खिलती है किसी शाख़ पे फूलों की तरह तू
उगता हूँ किसी झाड़ में कांँटो की तरह मैं
दिल भरते ही घर के किसी कोने में मिलूंँगा
बच्चों के पसंदीदा खिलौनों की तरह मैं
लूटा भी गया हूँ कभी छीना भी गया हूँ
ख़ैरात में बँटते हुए सिक्कों की तरह मैं
चुप-चाप खड़ा देखता रहता है मुझे तू
झड़ता हूँ तेरी शाख़ से पत्तों की तरह मैं
— Aditya Singh aadi














