एक ही शख़्स दिखे अब तो जिधर जाऊँ मैं
गर यही होना हो बेहतर है ठहर जाऊँ मैं
पैरहन काला तिरा और खुली ज़ुल्फें हैं
मैं अगर तुझ पे न मर जाऊँ तो मर जाऊँ मैं
राह-ए-उल्फ़त पे मुझे छोड़ के जाने वाले
ये बताता हुआ जाता के किधर जाऊँ मैं
वैसे उस शख़्स की जानिब नहीं जाना फिर भी
रोक लेना मुझे तुम लोग अगर जाऊँ मैं
कितनी गहराई में जाना है मुझे उठने को?
जब थमें साँस समंदर से उभर जाऊँ मैं
मैं इसी सोच में बैठा हुआ हूँ बोगी में
याद आए जो पता घर का उतर जाऊँ मैं
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Aqib khan
our suggestion based on Aqib khan
As you were reading Yaad Shayari Shayari