ek hi shaKHs dikhe ab to jidhar jaaun main | एक ही शख़्स दिखे अब तो जिधर जाऊँ मैं

  - Aqib khan

एक ही शख़्स दिखे अब तो जिधर जाऊँ मैं
गर यही होना हो बेहतर है ठहर जाऊँ मैं

पैरहन काला तिरा और खुली ज़ुल्फें हैं
मैं अगर तुझ पे न मर जाऊँ तो मर जाऊँ मैं

राह-ए-उल्फ़त पे मुझे छोड़ के जाने वाले
ये बताता हुआ जाता के किधर जाऊँ मैं

वैसे उस शख़्स की जानिब नहीं जाना फिर भी
रोक लेना मुझे तुम लोग अगर जाऊँ मैं

कितनी गहराई में जाना है मुझे उठने को?
जब थमें साँस समंदर से उभर जाऊँ मैं

मैं इसी सोच में बैठा हुआ हूँ बोगी में
याद आए जो पता घर का उतर जाऊँ मैं

  - Aqib khan

Yaad Shayari

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