jo chahte the ham vahii akshar na ho sakaa | जो चाहते थे हम वही अक्सर न हो सका

  - Aqib khan

जो चाहते थे हम वही अक्सर न हो सका
छूकर निकल गया वो मुयस्सर न हो सका

वा'दा न निभ सका न मुहब्बत ही हो सकी
हम सेे तो कोई काम समय पर न हो सका

हम से दिलों के साथ भी खेला नहीं गया
हम से हिसाब तक तो बराबर न हो सका

सोचा था तेरे बाद ये बे-हिस हो जाएगा
ये दिल है अब तलक भी जो पत्थर न हो सका

वो काम जो ख़ुशी ख़ुशी करते थे हम कभी
इस बार तो वो काम घड़ी-भर न हो सका

क्या ख़ूब ख़्वाब थे कि बसर होगी साथ में
पर असलियत में वो कभी मंज़र न हो सका

काँसा न थाम पाया मैं रुसवाइयों से डर
ऐसा फ़कीर हूँ मैं जो दर-दर न हो सका

  - Aqib khan

Terrorism Shayari

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