बिन तेरे मेरा घर भी लगे घर नहीं

ऐसा मानो की पंछी हो पर, पर नहीं

जल महल हो या हो आगरा का किला
तुम सा शीतल नहीं तुम सा सुंदर नहीं

पार्थ का नाम है हर गली हर नगर
पर वो नैनों से बेहतर धनुर्धर नहीं

रक्त बहता रहा साँस थमती रही
झुक गया था बदन पर झुका सर नहीं

क्यूँ मेरी बेवफ़ाई पे हैरान हो?
मैं कोई देवता या पयंबर नहीं

— Alankrat Srivastava

More by Alankrat Srivastava

Other ghazal from the same pen

See all from Alankrat Srivastava →

Haseen Shayari

Shers of haseen.

All Haseen Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling