"सावन की बारिश"

बचाने को सभी दानव व देवों को

धरा के जीव जंतु को
नदी पेडों को पर्वत को

इसी सावन महीने में
हलाहल था पिया शिव ने

इसी बारे में फिर जब जब
सती माँ सोचती होंगी

तो इक दो बूंद आँसू की
छलक जाती ही होंगी

सो सावन की ये बारिश
कुछ नहीं है बस

उन्हीं के आँख से टपकी
हुई आँसू की बूंदे हैं

लुड़क कर जो
ज़मीं पर आ गिरी हैं

— Alankrat Srivastava

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Dariya Shayari

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